करवा चौथः मधुर दांपत्य जीवन व्रत

अशोक “प्रवृद्ध”
भारत में पति-पत्नी के मध्य मधुर दाम्पत्य जीवन, उनके दीर्घायु होने व उज्जवल भविष्य की कामना से जुड़े सभी पर्व व त्योहार शिव और पार्वती से जुड़े हुए हैं। चाहे वह पर्व हरतालिका तीज हो, अथवा मंगलागौरी, अथवा जया-पार्वती हो या फिर करवा चौथ हो, सभी शिव- पार्वती से जुड़े हुए हैं । इसका कारण यह है कि भारतीय लोक व पौराणिक साहित्य के सर्वाधिक आदर्श और सबसे आकर्षक युगल शिव-पार्वती हैं । अपने पति के उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु उम्र के लिए सौभाग्यवती स्त्रियों के द्वारा कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को शिव-पार्वती से ही जुड़ी हुई व्रत करवाचौथ का व्रत रखे जाने की परम्परा है। यों तो प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश और चंद्रमा का व्रत किए जाने का विधान है, परंतु इन सबमें कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि को होने वाली शिव- पार्वती,गणेश और चंद्रमा पूजन व्रत का सर्वाधिक महत्त्व माना जाता है। इसे करवा चौथ के नाम से जाना जाता है और इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां अटल सुहाग, पति की दीर्घ आयु, उत्तम स्वास्थ्य एवं मंगलकामना हेतु यह व्रत करती हैं।

इस पर्व पर विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की लम्बी उम्र के लिये पूरे दिन का व्रत रख शाम को चन्द्रमा दर्शन के बाद पति के हाथ से जल पीकर व्रत समाप्त करती हैं। कुंवारी लड़की अपने लिए शिव की तरह प्रेम करने वाले पति की कामना करती है और इसके लिए सोमवार से लेकर जया-पार्वती तक के सभी व्रत पूरी आस्था से करती है। इसी तरह करवा चौथ का संबंध भी शिव और पार्वती से है। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान और गुजरात सहित अधिकांश भारत में स्त्रियों के लिए सर्वाधिक प्रिय करवा चौथ के व्रत के दिन व्रती स्त्रियों को प्रात:काल स्नान आदि के बाद आचमन करके पति, पुत्र-पौत्र तथा सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर इस व्रत को करना चाहिए। व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणेश तथा चंद्रमा का पूजन करने का विधान है। स्त्रियां चंद्रोदय के बाद चंद्रमा के दर्शन कर अर्ध्य देकर ही जल-भोजन ग्रहण करती हैं।पूजा के बाद तांबे या मिट्टी के करवे में चावल, उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री यथा, कंघी, शीशा, सिन्दूर, चूड़ियां, रिबन व रुपया रखकर दान करना चाहिए तथा सास के पांव छूकर फल, मेवा व सुहाग की सारी सामग्री उन्हें देनी चाहिए।

करवाचौथ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – करवा और चौथ। करवा अर्थात मिट्टी का बरतन और चौथ अर्थात चतुर्थी। इस त्योहार पर मिट्टी के बरतन यानी करवे का विशेष महत्व माना गया है। पति – पत्नी के मध्य मधुर सम्बन्ध, मजबूत रिश्ते, प्यार व बिश्वास का प्रतीक करवा चौथ त्यौहार का सभी विवाहित स्त्रियां साल भर इंतजार करती हैं और इसकी सभी विधियों को बड़े श्रद्धा-भाव से पूर्ण कर मनोवांछित फल की कामना करती हैं।

करवाचौथ के सम्बन्ध में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। महाभारत, वामन पुराण आदि ग्रन्थों में करवा चौथ व्रत का वर्णन अंकित है। लोक मान्यतानुसार अतिप्राचीन काल से देवताओं के समय से ही चली आ रही करवा चौथ के सम्बन्ध में प्रचलित कथा के अनुसार एक बार देवताओं और दानवों में युद्ध शुरू हो गया और उस युद्ध में देवताओं की हार होने लगी। यह देख देवता ब्रह्मा के पास जा रक्षा हेतु प्रार्थना करने लगे। ब्रह्मा ने कहा कि इस संकट से बचने के लिए सभी देवताओं की पत्नियों को अपने-अपने पतियों के लिए व्रत रख सच्चे दिल से उनकी विजय के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। ऐसा करने पर निश्चित ही इस युद्ध में देवताओं की जीत होगी।

ब्रह्मा के इस सुझाव को सभी देवताओं और उनकी पत्नियों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया, और ब्रह्मा के कथनानुसार कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी देवताओं की पत्नियों ने व्रत रखा और अपने पतियों यानी देवताओं की विजय के लिए परमात्मा से प्रार्थना की। उनकी यह प्रार्थना स्वीकार हुई और युद्ध में देवताओं की जीत हुई। इस शुभ समाचार को सुन कर सभी देव पत्नियों ने अपना व्रत खोला और अन्न -जल ग्रहण किया । उस समय आकाश में चांद भी निकल आया था। मान्यता है कि इसी दिन से करवाचौथ के व्रत के परंपरा शुरू हुई।

महाभारत में भी करवाचौथ के महात्म्य पर एक कथा का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार एक बार अर्जुन के नीलगिरि पर तपस्या करने हेतु जाने पर द्रौपदी ने सोचा कि यहाँ हर समय अनेक प्रकार की विघ्न-बाधाएं आती रहती हैं। उनके शमन के लिए अर्जुन तो यहाँ हैं नहीं, अत: कोई उपाय करना चाहिए। यह सोचकर उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किया। श्रीकृष्ण वहाँ उपस्थित हुए तो द्रौपदी ने अपने कष्टों के निवारण हेतु कोई उपाय बताने को कहा। इस पर श्रीकृष्ण बोले- एक बार पार्वती के द्वारा भी भगवान शिव से यही प्रश्न किए जाने पर शिव ने करवा चौथ के सम्बन्ध में बताते हुए कहा था कि करवाचौथ का व्रत गृहस्थी मंह आने वाली छोटी-मोटी विघ्न-बाधाओं को दूर करने वाला है। यह पित्त प्रकोप को भी दूर करता है। फिर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को शिव द्वारा पार्वती को वह कथा सुनाते हुए कहा कि प्राचीनकाल में शाकप्रस्थपुर वेदधर्मा धर्मपरायण ब्राह्मण के सात पुत्र तथा एक पुत्री वीरवती थी। बड़ी होने पर पुत्री वीरवती का विवाह कर दिया गया। कार्तिक की कृष्ण चतुर्थी को वीरवती ने करवा चौथ का व्रत रखा।

सात भाईयों की लाड़ली बहन को चंद्रोदय से पहले ही भूख सताने लगी, जिससे उसका फूल सा चेहरा मुरझा गया। भाईयों के लिए बहन की यह वेदना असहनीय थी। अत: वे कुछ उपाय सोचने लगे। उन्होंने बहन से चंद्रोदय से पहले ही भोजन करने को कहा, पर बहन न मानी। तब भाईयों ने स्नेहवश पीपल के वृक्ष की आड़ में प्रकाश करके असंख्य छिद्रों से निर्मित एक पात्र चलनी की ओट से अपनी बहन को चंद्रोदय होते दिखा दिया, और कहा बहन उठी और चंद्रमा को अर्ध्य देकर भोजन कर लिया। भोजन करते ही उसका पति मर गया। वह रोने चिल्लाने लगी। दैवयोग से इन्द्राणी (शची) देवदासियों के साथ वहाँ से जा रही थीं। रोने की आवाज़ सुन वे वहाँ गईं और उससे रोने का कारण पूछा। ब्राह्मण कन्या के द्वारा सब हाल कह सुनाने पर इन्द्राणी ने कहा- तुमने करवा चौथ के व्रत में चंद्रोदय से पूर्व ही अन्न-जल ग्रहण कर लिया, इसी से तुम्हारे पति की मृत्यु हुई है। अब यदि तुम मृत पति की सेवा करती हुई बारह महीनों तक प्रत्येक चौथ को यथाविधि व्रत करते हुए करवा चौथ को विधिवत गौरी, शिव, गणेश, कार्तिकेय सहित चंद्रमा का पूजन करो तथा चंद्रोदय के बाद अर्ध्य देकर अन्न-जल ग्रहण करो तो तुम्हारे पति अवश्य जीवित हो उठेंगे। ब्राह्मण कन्या ने अगले वर्ष बारह माह की चौथ सहित विधिपूर्वक करवा चौथ का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसका मृत पति जीवित हो गया। भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को करवाचौथ की यह कथा सुनाते हुए कहा था कि पूर्ण श्रद्धा और विधि-पूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-सौभाग्य तथा धन-धान्य की प्राप्ति होने लगती है।

श्री कृष्ण भगवान की आज्ञा मानकर द्रौपदी ने भी करवा-चौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही अर्जुन सहित पांचों पांडवों ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की सेना को पराजित कर विजय प्राप्त की की। मान्यता है कि इसके पश्चात ही करवाचौथ का व्रत शुरू हुई। कुछ स्थानों पर यह कथा कतिपय फेरबदल के साथ कही गई है, लेकिन मूल कथा वही है। इसी कथा में कुछ स्थानों पर सात के स्थान चार भाई ही कहे गये हैं और बहन का नाम नदारद है। कहीं पिता को ब्राह्मण के स्थान साहुकार कहा गया है । कुछ कथाओं से सात भाईयों के एकलौती बहन व उसके पिता के निवास स्थल का जिक्र नहीं है तो कुछ में पिता का नाम भी गायब है। कुछ स्थानों पर सात भाईयों की पत्नियों अर्थात वेदवती की भौजाईयों अर्थात भाभियों की बात और उनसे सम्बन्धित कथा भी जोड़ी गई है । लेकिन सभी कथाओं में भाईयों द्वारा पीपल के पेड़ की आड़ में प्रकाश करके चलनी की ओट से बहन को प्रकाश दिखाने की बात आई है।

करवाचौथ के प्रारम्भ से जुडी एक अन्य कथा के अनुसार प्राचीन समय में करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री अपने वृद्ध पति के साथ नदी किनारे के एक गाँव में रहती थी। एक दिन वह वृद्ध व्यक्ति नदी में स्नान करने गया, तो नदी में नहाते समय एक मगर ने उसे पकड़ लिया। इस पर वह वृद्ध व्यक्ति अपनी पत्नी को करवा करवा चिल्लाकर अपनी पत्नी को सहायता के लिए पुकारने लगा। करवा पतिव्रता स्त्री थी। आवाज़ को सुनकर करवा भागकर अपने पति के पास पहुँची और दौड़कर कच्चे धागे से मगर को आन देकर बांध दिया। मगर को सूत के कच्चे धागे से बांधने के बाद करवा यमराज के पास पहुँची। वे उस समय चित्रगुप्त द्वारा लिखित खाते को देख रहे थे। करवा ने सात सींक ले उन्हें झाड़ना शुरू किया, जिससे यमराज के खाते आकाश में उड़ने लगे। यमराज घबरा गए और बोले- तू क्या चाहती है? करवा ने कहा- एक मगर ने नदी के जल में मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। उस मगर को आप अपनी शक्ति से अपने लोक अर्थात नरक में ले आओ और मेरे पति को चिरायु करो। करवा की बात सुनकर यमराज ने कहा कि अभी मगर की आयु शेष है। अत: आयु रहते हुए मैं असमय मगर को मार नहीं सकता।

इस पर करवा ने कहा- यदि मगर को मारकर आप मेरे पति की रक्षा नहीं करोगे, तो मैं शाप देकर आपको नष्ट कर दूंगी। करवा की धमकी से भयभीत यमराज डर कर करवा के साथ वहाँ आए, जहाँ मगर ने उसके पति को पकड़ रखा था। यमराज ने मगर को मारकर यमलोक पहुँचा दिया और करवा के पति की प्राण रक्षा कर उसे दीर्घायु प्रदान की। जाते समय वह करवा को सुख-समृद्धि देते गए तथा यह वर भी दिया- जो स्त्री इस दिन व्रत करेगी, उनके सौभाग्य की मैं रक्षा करूंगा। करवा ने पतिव्रत के बल से अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी। इस घटना के दिन से करवा चौथ का व्रत करवा के नाम से प्रचलित हो गया। जिस दिन करवा ने अपने पति के प्राण बचाए थे, उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चौथ थी। इस पर्व से संबंधित अनेक कथाएं जुड़ी हुई है हैं जिनमें से एक सत्यवान और सावित्री की कहानी भी अत्यंत प्रसिद्ध है।
लोक मान्यता है कि करवाचौथ की कथा सुनने से विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहता है, उनके घर में सुख, शान्ति,समृद्धि और सन्तान सुख मिलता है। परंपरा, अध्यात्म, प्यार, समर्पण, प्रकृति प्रेम, और जीवन सबको एक साथ, एक सूत्र में पिरोकर, सदियों से चलता आ रहा करवाचौथ का व्रत भारतीय आध्यात्मिक धार्मिक संस्कृति का अनुपम उदाहरण है। भारतीय महिलाओं की आस्था, परंपरा, धार्मिकता, अपने पति के लिये प्यार, सम्मान, समर्पण, इस एक व्रत में सब कुछ निहित है। भारतीय पत्नी की सारी दुनिया, उसके पति से शुरू होती है उन्हीं पर समाप्त होती है। चाँद को इसीलिये इसका प्रतीक माना गया है क्योंकि चाँद भी धरती के कक्षा में जिस तन्मयता, प्यार समर्पण से वो धरती के इर्द गिर्द रहता है, भारतीय स्त्रियां उसी प्रतीक को अपना लेती हैं।

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