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डॉक्टरों को कोरोना से सुरक्षा चाहिए!

भारतीय जनता पार्टी का नारा रहा है- दूध मांगोगे तो खीर देंगे। उसकी सरकार भी ऐसा लग रहा है कि इसी अंदाज में काम कर रही है। देश भर के डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी कोरोना वायरस के संक्रमण से सुरक्षा मांग रहे हैं। वे चाहते हैं कि सरकार बेहतर क्वालिटी के पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट, पीपीई उपलब्ध कराए। पीपीई की संख्या इतनी हो कि हर डॉक्टर अपनी एक शिफ्ट में जितनी बार जरूरी हो उतनी बार उसे बदल सके। यह भी जरूरी है कि कोरोना वायरस से इतर दूसरी बीमारियों का इलाज कर रहे डॉक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों के लिए भी पीपीआई उपलब्ध हो। सभी स्वास्थ्यकर्मियों की प्राथमिकता के आधार पर जांच की व्यवस्था हो। पर यह व्यवस्था करने की बजाय सरकार ने डॉक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों पर इधर-उधर होने वाले हमले से उनको बचाने के लिए कानून को सख्त करने का फैसला किया है।

सोचें, डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी चाहते हैं कि उनको कोरोना वायरस के संक्रमण से सुरक्षा मिले तो सरकार ने उनको गुंडों से सुरक्षा देने का कानून बना दिया है। सरकार ने 1897 में बने महामारी कानून में बदलाव किया है। हालांकि यह भी हैरान करने वाली बात है कि सारे पुराने कानूनों को खत्म करने का दावा करने वाली इस सरकार ने 123 साल पुराना कानून अब तक क्यों बनाए रखा है। बहरहाल, उस कानून में अध्यादेश के जरिए बदलाव किया गया है और यह प्रावधान किया गया है कि डॉक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला करने वालों को अब सात साल तक की सजा हो सकती है और पांच लाख रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है।

देश के ज्यादातर राज्यों में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले को लेकर पहले से सख्त कानून हैं। उसके लिए अलग से किसी कानून की जरूरत नहीं थी। पर ऐसा लग रहा है कि सरकार डॉक्टरों, नर्सों और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों को जरूरी सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने में नाकाम हो रही है इसलिए उन पर हमले के खिलाफ सख्त कानून का झुनझुना उनको पकड़ाया गया है। आम लोगों की सामूहिक चेतना को भी बरगलाने का प्रयास इसके जरिए हुआ है क्योंकि देश भर के अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सों आदि के संक्रमित होने की खबरें आम लोगों को भी विचलित कर रही हैं।

अगर आधिकारिक रूप से आई खबरों को ही आधार मानें तो इस समय देश भर में दो सौ से ज्यादा डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए हैं। इनमें से एक सौ से ज्यादा संख्या दिल्ली, मुंबई के स्वास्थ्यकर्मियों की है। इस संक्रमण को रोकने के लिए जरूरी सुरक्षा उपकरण यानी पीपीई नहीं होने से देश के ज्यादातर निजी अस्पतालों ने कामकाज बंद कर दिया है। सरकार ने कहा है कि कोरोना से इतर दूसरी बीमारियों के मरीजों के इलाज में अस्पताल कोताही नहीं करेंगे पर हकीकत यह है कि किसी भी बीमारी के मरीज को अस्पताल अपने यहां भर्ती नहीं कर रहे हैं। दिल्ली, मुंबई सहित देश के हर हिस्से से ऐसी खबरें आई हैं कि अस्पतालों ने दूसरी बीमारियों के मरीजों को अपने यहां भरती नहीं किया और घंटों इधर उधर भटकने के बाद मरीज की मौत हो गई।

कोरोना वायरस से संक्रमित डॉक्टरों और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों की वास्तविक संख्या बता पाना मुश्किल है पर डॉक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों में संक्रमण से प्रभावित होने वाले अस्पतालों से भी इसका अंदाजा होता है। दिल्ली में गंगाराम हॉस्पिटल में डॉक्टर संक्रमित पाए गए, दिल्ली कैंसर इंस्टीच्यूट में कई डॉक्टर और नर्सें संक्रमित मिलीं। दिल्ली के मोहल्ल क्लीनिक के डॉक्टर संक्रमित मिले। एम्स के डॉक्टर दंपत्ति को संक्रमण हुआ। सफदरजंग और महाराजा अग्रसेन अस्पताल में भी डॉक्टरों में संक्रमण हुआ। मुंबई में नामी अस्पताल- वोकहॉर्ट, जसलोक, हिंदूजा आदि में ताला लग गया। एक-एक अस्पताल में दर्जनों डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित मिले। इंदौर के अलग अलग अस्पतालों में संक्रमण से डॉक्टरों की मौत हो गई। राजस्थान के अकेले भीलवाड़ा में डेढ़ दर्जन डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित मिले। तमिलनाडु में एक न्यूरो सर्जन को संक्रमण हो गया। लखनऊ के किंग जॉर्ज अस्पताल में, बंगाल के सिलिगुड़ी में नॉर्थ बंगाल मेडिकल कॉलेज में, हैदराबाद के निजी अस्पताल में डॉक्टर व स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित हुए।  जब इस तरह की घटनाएं बढ़ीं तो इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, आईएमए ने सांकेतिक हड़ताल का ऐलान किया। इसके बाद खुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आईएमए के प्रतिनिधियों से बात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि सरकार डॉक्टरों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखेगी। इससे पहले नर्स और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई गई थी, जिसमें सरकार को यह निर्देश देने की मांग की गई थी वह स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई निर्देश देने की बजाय सरकार की बात मान कर याचिका ही खारिज कर दी। सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वह सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।

हालांकि उस भरोसे के बावजूद डॉक्टर, नर्स आदि की सुरक्षा भगवान भरोसे है। उधर असम से खबर आई कि वहां चीन से आया पीपीई किट भेजा गया था, जिसके बारे में स्थानीय मीडिया में खबर आई गई कि ये किट डीआरडीओ की ग्वालियर लैब ने खराब बता कर खारिज कर दिए हैं। सो, असम के डॉक्टरों और नर्सों ने इनके इस्तेमाल से मना कर दिया और काम नहीं करने की चेतावनी दी। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित हो रहे हैं पर भारत जैसे हालात कहीं नहीं हैं कि डॉक्टर सुरक्षा उपकरण नहीं मिलने की वजह से हड़ताल की चेतावनी दें।

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