बहुत जानलेवा है वायु प्रदूषण

कई अध्ययनों ने यह दिखाया गया है कि कोरोना महामारी उन लोगों के लिए अधिक जानलेवा है, जो वायु प्रदूषण का शिकार हैं। वायु प्रदूषण मनुष्य की प्रतिरक्षण क्षमता को कम कर देता है, जो कई बीमारियों और असमय मौत की वजह बनता है। अब एक नए इंडेक्स का निष्कर्ष है कि वायु प्रदूषण मनुष्य के लिए सबसे खतरनाक कारणों में एक है। एयर क्वॉलिटी लाइफ इंडेक्स (एक्यूएलआई) में यह कहा गया है। एक्यूएलआई एक ऐसा सूचकांक है जिसमें जिवाश्म ईंधन के जलाए जाने से निकलने वाले पार्टिकुलेट वायु प्रदूषण के मानव स्वास्थ्य पर असर को आंका जाता है। सूचकांक का कहना है कि एक तरफ तो दुनिया कोविड-19 महामारी पर काबू पाने के लिए टीके की खोज में लगी हुई है, लेकिन वायु प्रदूषण की वजह से पूरी दुनिया में करोड़ों लोग का जीवन और छोटा और बीमार होता चला जा रहा है। क्यूएलआई ने पाया कि चीन में पार्टिकुलेट मैटर में काफी कमी आने के बावजूद पिछले दो दशकों से वायु प्रदूषण कुल मिला कर एक ही स्तर पर स्थिर है। भारत और बांग्लादेश जैसे देशों में वायु प्रदूषण की स्थिति इतना गंभीर है कि कुछ इलाकों में इसकी वजह से लोगों की औसत जीवन अवधि एक दशक तक घटती जा रही है।

शोधकर्ताओं ने कहा है कि कई जगहों पर लोग जिस हवा में सांस लेते हैं उसकी गुणवत्ता से मानव स्वास्थ्य को कोविड-19 से कहीं ज्यादा बड़ा खतरा है। शोधकर्ताओं के मुताबिक कोरोना वायरस से इनसान को गंभीर खतरा है और इस पर जो ध्यान दिया जा रहा है, वो दिया ही जाना चाहिए। लेकिन अगर थोड़ा ध्यान वायु प्रदूषण की गंभीरता पर भी दे दिया जाए तो करोड़ों लोगों और लंबा और स्वस्थ जीवन दिया जा सकता है। दुनिया की लगभग एक चौथाई आबादी सिर्फ उन चार दक्षिण एशियाई देशों में रहती है, जो सबसे ज्यादा प्रदूषित देशों में से हैं। ये हैं- बांग्लादेश, भारत, नेपाल और पाकिस्तान। एक्यूएलआई ने पाया कि इन देशों में रहने वालों की जीवन अवधि औसतन पांच साल तक घट जाएगी, क्योंकि ये ऐसे हालात में रह रहे हैं जिनमें 20 साल पहले के मुकाबले प्रदूषण का स्तर अब 44 प्रतिशत ज्यादा है। एक्यूएलआई ने कहा कि अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देश वायु की गुणवत्ता को सुधारने में सफल रहे हैं लेकिन फिर भी प्रदूषण दुनिया भर में आयु संभाविता से औसत दो साल घटा ही रहा है। तो जाहिर है, दक्षिण एशियाई देशों के लिए यह जागने का वक्त है।

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