डोनल्ड ट्रंप की मारक नीति

डोनल्ड ट्रंप प्रशासन ने पिछले महीने एच-1बी और एल श्रेणी के रोजगार वीजा के लिए नए आवेदनों पर साल के अंत तक प्रतिबंध लगा दिया। प्रशासन ने उन पर भी प्रतिबंध लगा दिया, जिनके पास वीजा है, लेकिन वे अमेरिका से बाहर हैं और उन्हें वीजा की अवधि बढ़वानी है। ऐसा करने से ऐसे लोग अमेरिका में अपने करीबी लोगों और अपनी जिंदगी से प्रभावी रूप से कट गए हैं। भारतीय समुदाय के लोगों पर इसका बहुत बुरा असर पड़ा है। अमेरिका में मौजूद ऐसे लोगों की मुश्किल भी कम नहीं है। कोरोना वायरस की वजह से अमेरिका के दूतावास लंबे समय से बंद हैं। इस वजह से अप्रवासियों को अपने वीजा बढ़वा कर पासपोर्ट पर मुहर लगवाने के लिए आवश्यक अपॉइंटमेंट को टाल देने पर मजबूर होना पड़ा है। इससे एक लंबा बैकलॉग बन गया है।

साफ है, राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के निर्णय ने आप्रावासियों की जिंदगी को उलट-पलट कर रख दिया है। इसमें भारतीय इसलिए विशेष रूप से प्रभावित हुए हैं, क्योंकि एच-1बी आवेदकों में 75 प्रतिशत भारतीय ही हैं। यही कारण है कि अब 174 भारतीय नागरिकों के एक समूह ने ट्रंप प्रशासन के इस आदेश के खिलाफ अमेरिका के कोलंबिया की जिला अदालत में मुकदमा दायर कर दिया है। जज ने 15 जुलाई को अमेरिकी सरकार को नोटिस भी जारी कर दिया। मुकदमा करने वालों ने अदालत से मांग की है कि वे ट्रंप प्रशासन के आदेश को गैर कानूनी करार करार दे और प्रशासन को वीजा के सभी लंबित आवेदनों को भी मंजूरी देने के निर्देश दे। जबकि ट्रंप ने आप्रवासन को अपने फिर से राष्ट्रपति चुने जाने के अभियान का केंद्रीय मुद्दा बना दिया है। इस आदेश को देश की आर्थिक समस्याओं का इलाज बताया है। लेकिन उनके आलोचकों का कहना है कि इस कदम से आर्थिक वृद्धि दर को बहाल करने में बिल्कुल मदद नहीं मिलेगी। उलटे इससे इसमें दिक्कत आ सकती है। दरअसल, होगा यह कि कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियां स्थानीय लोगों को काम देने के बजाय नौकरियां दूसरे देशों में स्थानांतरित कर देंगी। अनेक विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम खुद को दिए गए जख्म जैसा है। मगर ट्रंप की राय है कि ये नीतियां उनके मतदाताओं को पसंद आएंगी। यह दीगर बात है कि इसका अर्थव्यवस्था पर बहुत ही खराब असर पड़ेगा। मगर ट्रंप शायद ही कभी अपने निजी हित के खिलाफ जाने वाली ऐसी बातों की फिक्र करते हैं।

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