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संवाद बनाते तो अच्छा होता

वैसे ये फैसला सही दिशा में है, लेकिन बेहतर होता कि इसे लागू करने के पहले लोगों से आम सहमति बनाने की कोशिश की जाती। ऐसा ना करने का ही परिणाम है कि असम के विभिन्न अल्पसंख्यक और हिंदू संगठनों ने सरकारी मदद से चलने वाले मदरसों और संस्कृत आश्रमों या संस्थानों को बंद करने के सरकार के फैसले की आलोचना की है। कई संगठनों ने असम सरकार के इस फैसले को संविधान के खिलाफ बताया है। असम राज्य जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इस फैसले को कानूनी चुनौती देने की घोषणा की है। असम सरकार ने इन मदरसों और आश्रमों को हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूल में बदलने का फैसला किया है। लेकिन यहां धार्मिक विषयों की पढ़ाई नहीं होगी। इन संस्थानों में धार्मिक विषयों को पढ़ाने वाले शिक्षकों को बिना काम के ही सेवानिवृत्ति तक वेतन दिया जाएगा। असम सरकार ने कहा है कि राज्य सरकार की ओऱ से संचालित मदरसों और संस्कृत आश्रमों को अगले तीन से चार महीनों के भीतर बंद कर दिया जाएगा। इनको नियमित पाठ्यक्रमों वाले उच्च और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में बदल दिया जाएगा। सरकार का यह कहना वाजिब है कि धार्मिक शिक्षा देना या अरबी या ऐसी दूसरी भाषाओं की पढ़ाई वाले संस्थानों को धन मुहैया कराना सरकार का काम नहीं है। असम में लगभग 1,200 मदरसे और 200 संस्कृत आश्रम हैं। लेकिन इनमें से 614 मदरसों और 101 संस्कृत आश्रमों को सरकारी सहायता दी जाती रही है। अगर पवित्र कुरान की शिक्षाएं देने के लिए सरकार की ओर से मुहैया कराए जाने वाले धन का इस्तेमाल किया जाता है, तो गीता और बाइबल की शिक्षा भी देनी पड़ेगी। ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फोरम (एआईयूडीएफ) का कहना है कि भाजपा सरकार मदरसों के साथ संस्कृत संस्थानों से अपना पल्ला झाड़ते हुए खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने का प्रयास कर रही है। अखिल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ ने कहा है कि सरकार ने मुस्लिमों को परेशान करने के लिए यह फैसला किया है। मदरसों में सिर्फ धार्मिक ग्रंथों और अरबी की ही पढ़ाई नहीं होती, बल्कि नियमित स्कूलों की तरह दूसरे विषय भी पढ़ाए जाते हैं। आज के माहौल में ऐसा शक पैदा होना अस्वाभाविक नहीं है। इसीलिए आवश्यकता पहले संवाद बनाने और फिर कदम उठाने की थी। ऐसा ना करने का नतीजा है कि पहले से ही सुलग रहे राज्य में एक ऩया मसला पैदा हो गया है।

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