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ये कामयाबी फ़ौरी है

खबरों के मुताबिक अमेरिका और फ्रांस के एतराज के चलते संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में फिर से कश्मीर का मसला उठाने की कोशिश नाकाम हो गई। ऐसा स्थायी रूप से हुआ है या नहीं, यह नहीं मालूम। बहरहाल, चीन का फिर से इस मुद्दे को एजेंडे पर ले आना बताता है कि ये सवाल अब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के लिए मुश्किलें खड़ा कर सकता है। इस साल 5 अगस्त को भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया था। चीन ने 16 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया था। अब पिछले 12 दिसंबर को पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को पत्र लिख कर कश्मीर पर बढ़ते तनाव का जिक्र किया। चीन ने सुरक्षा परिषद के सदस्यों को लिखे पत्र में कहा कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए और तनाव बढ़ने की आशंका के बीच चीन पाकिस्तान के अनुरोध का समर्थन करता है और सुरक्षा परिषद में जम्मू-कश्मीर के हालात पर चर्चा कराने की मांग करता है। मगर गौरतलब है कि पिछली बैठक में भी ऐसा कोई बयान या फैसला नहीं लिया जा सका था, जिसे भारत के लिए असहज स्थिति पैदा होती। हालांकि सुरक्षा परिषद में इस मामले का उठना ही भारत के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर का मुद्दा दशकों से तनाव का कारण बना हुआ है। भारत बार-बार कहता आया है कि कश्मीर का मसला आंतरिक है और उसे इस पर किसी भी देश या संस्था का दखल मंजूर नहीं है। इसे मोटे तौर पर दुनिया ने स्वीकार भी किया है। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। कश्मीर में पिछले 135 दिनों से इंटरेनट बंद है, जो भारत में अब तक का दूसरा सबसे लंबा दौर है। एक राय यह है कि पांच अगस्त को सरकार ने जो भी घोषित किया था, उसका ठीक उल्टा इस वक्त कश्मीर घाटी में हो रहा है। घोषणा यह की गई थी कश्मीर का बाकी देश के साथ एकीकरण हो जाएगा, लेकिन अब सवाल उठा रहा है कि क्या अब एकीकरण की रही सही गुंजाइश भी खत्म हो गई है? कहा गया था कि धारा 370 खत्म होने से कश्मीरियों में भारत के प्रति बेहतर भावना बनेगी। कहा गया था कि कश्मीर का विकास होगा, सच यह है कि उद्योग जगत को भारी आर्थिक झटका लगा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को कब तक रोका जा सकेगा, ये बड़ा सवाल है।

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