बांग्लादेश में चीन की पैठ

क्या नेपाल के बाद अब बांग्लादेश भी चीन के पाले में जा रहा है? ये सवाल हाल के कुछ संकेतों से उठा है। हालांकि कई जानकारों का कहना है कि चीन से हालिया नजदीकी को स्थायी मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन वे इतना जरूर मानते हैं कि इससे चीन को फायदा हो रहा है। इसके अलावा पाकिस्तान भी अचानक आगे बढ़कर बांग्लादेश के साथ संबंध सुधारने की कोशिश करता दिख रहा है। इसी महीने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बांग्लादेशी प्रधानमंत्री हसीना से फोन पर बात की, जिस पर सबका ध्यान गया। भारत और बांग्लादेश के बीच ना केवल गहरे आर्थिक, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध भी रहे हैं। मगर इसमें भारत सरकार के विवादित नागरिकता कानून (सीएए) के चलते काफी तनाव आया। बांग्लादेश में सीएए की कड़ी निंदा हुई और इसे मोदी सरकार की हिंदू-मुसलमानों के बीच तनाव भड़काने की कोशिश तक बताया गया। दिसंबर 2019 से भारत में तीन मुस्लिम बहुल देशों से आने वाले गैर-मुसलमान शरणार्थियों को फास्ट-ट्रैक नागरिकता देने के लिए ये कानून बनाया गया था।

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस कानून को ‘गैर जरूरी’ बताया और उसके बाद भारत के साथ होने वाली कई द्विपक्षीय मुलाकातों को रद्द कर दिया। चार महीने से बांग्लादेश में भारत की हाई कमिश्नर रीवा गांगुली से गांगुली के तमाम अनुरोधों के बावजूद हसीना नहीं मिली हैं। विदेश मामलों के जानकार इसे भारत के प्रति अपना असंतोष जताने का एक तरीका बताते हैं। शायद इसी मौके का फायदा उठाते हुए चीन अचानक सक्रिय हो गया है। चीन पहले से ही दक्षिण एशिया में अपने सहयोगियों का नेटवर्क बनाने की कोशिश में लगा था। भारत से नाराजगी को देखते हुए चीन ने बांग्लादेश के करीब आने की कोशिशें तेज कर दीं। दोनों देशों के बीच कई नए क्षेत्रों में सहयोग की बिसात बिछाई जा रही है। हाल ही में चीन ने 97 फीसदी बांग्लादेशी उत्पादों को निर्यात शुल्क में छूट देने की घोषणा की। इसका मतलब हुआ कि बांग्लादेश के करीब 8,200 उत्पादों की चीनी बाजार में ड्यूटी-फ्री पहुंच होगी। बांग्लादेश में सबसे बड़ा विदेशी निवेशक भी चीन ही है। वह बेल्ट एंड रोड योजना के तहत पहले से ही बांग्लादेश में ढांचागत विकास पर काफी निवेश कर रहा था। उधर भारत प्रायोजित परियोजनाओं की रफ्तार धीमी पड़ गई है। इन सबको बदलते माहौल का संकेत समझा गया है।

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