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ऐप और उठे सवाल

बीते साल जहां सिर्फ एक आरोग्य सेतु ऐप ही था, वहीं अब ऐसे कम से कम 19 ऐप आ गए हैं। अब बिहार और केरल समेत ज्यादातर राज्यों ने अपने अलग ऐप बनाए हैं। मुद्दा यह है कि जब आरोग्य सेतु दूसरी लहर से भारत को नहीं बचा पाया, तो ये नए ऐप कितने कारगर होंगे?

कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर आई, तो महामारी की निगरानी के लिए लॉन्च किए गए ऐप फिर चर्चा में आए। महामारी की शुरुआत में भारत में आरोग्य सेतु ऐप की खूब चर्चा हुई थी। सरकार ने उसे एक तरह का ‘पासपोर्ट’ बना दिया था, जिसे रखे बिना कई अहम जगहों पर जाना संभव नहीं था। इस बार आरोग्य सेतु की उतनी चर्चा नहीं है। लेकिन बीते साल जहां सिर्फ एक आरोग्य सेतु ऐप ही था, वहीं अब ऐसे कम से कम 19 ऐप आ गए हैं। अब बिहार और केरल समेत ज्यादातर राज्यों ने अपने अलग ऐप बनाए हैं। मुद्दा यह है कि जब आरोग्य सेतु दूसरी लहर से भारत को नहीं बचा पाया, तो ये नए ऐप कितने कारगर होंगे? आरोग्य सेतु को पिछले साल 17 करोड़ लोगों ने डाउनलोड किया था। बहरहाल, ऐसे ऐप के साथ डेटा की गोपनीयता का सवाल लगातार बना हुआ है। इसे पिछले साल भी उठाया गया था।

अब ऐसे ऐप की बढ़ती तादाद ने आंकड़ों की गोपनीयता के सवाल को एक बार फिर सतह पर ला दिया है। मिसाल के तौर पर केरल में पुलिस क्वारंटीन में रहने वाले मरीजों पर निगाह रखने के लिए अनमेज ऐप का इस्तेमाल कर रही है। वहीं कासरगोड पुलिस बीते 25 मार्च से कोविड सेफ्टी ऐप का इस्तेमाल कर रही है। इसके जरिए 20 हजार लोगों पर निगाह रखी जा रही है। यह ऐप क्वारंटीन में रहने वालों के लोकेशन पुलिस मुख्यालय को भेजता है। कोच्चि पुलिस का दावा है कि इसके जरिए क्वांरटीन नियमों का उल्लंघन करने वाले तीन हजार लोगों का पता ऐप से चला। केरल सरकार स्वास्थ्य पर ताजा अपडेट्स देने के लिए गो-के-डाइरेक्ट केरल ऐप का इस्तेमाल कर रही है। केंद्रीय सूचना तकनीक मंत्रालय ने भी आम लोगों के इलाज और जांच से संबंधित आंकड़े जुटाने के लिए कोविड-19 फीडबैक ऐप लॉन्च किया है। सरकार का दावा है कि इन आंकड़ों से उन इलाकों की शिनाख्त करने में मदद मिलती है, जहां जांच और इलाज में सुधार जरूरी है। सर्वे ऑफ इंडिया ने भी कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए सहयोग नामक ऐप बनाया है। इसके लिए राज्य स्तर पर आंकड़े जुटाए जाते हैं। ऐसे ही कई अन्य राज्यों ने अलग-अलग ऐप बनाए हैं। कहीं इनके जरिए ई-पास भी जारी किए जा रहे हैं। लेकिन सवाल वही है। इतने ऐप के बावजूद इतनी मौतें क्यों हुईं? ये ऐप रोग रोकने के लिए हैं, या लोगों के डेटा चुराने के लिए?

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