सही वक्त पर जरूरी चेतावनी

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कोरोना वायरस से फैले संकट ने कई मोर्चों पर बिल्कुल नए हालात पैदा कर दिए हैं। बल्कि कहा जा सकता है कि इससे पूरी विश्व व्यवस्था हिल गई है। और जब विश्व व्यवस्था हिल गई हो, तो जाहिर है इस व्यवस्था से जुड़े नियम-कायदों के सामने अभूतपूर्व चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इन कायदों में ही एक मानवाधिकारों से जुड़े सवाल हैं। अब संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि कोरोना वायरस महामारी तेजी से एक मानव संकट से मानवाधिकार संकट में बदल रही है। यह कहने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंटोनियो गुटेरेश ने एक वीडियो संदेश प्रसारित किया। उसमें गुटेरेश ने कहा कोविड-19 से लड़ने में जन सुविधाओं को लोगों तक पहुंचाने में भेदभाव हो रहा है। कुछ ढांचागत असमानताएं हैं जो इन सेवाओं को सब तक पहुंचने नहीं दे रहीं हैं। कहा कि इस महामारी के दौरान कुछ समुदायों पर कुछ ज्यादा असर पड़ा है। हेट स्पीच, कमजोर समूहों को निशाना बनाना, और पुलिस कार्रवाई की सख्ती से कमजोर तबकों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। गुटारेस का संदेश जारी एक ताजा रिपोर्ट के सिलसिले में आया। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारों को नौकरियों, आजीविका, मूल सुविधाओं तक पहुंच और पारिवारिक जीवन पर कोविड-19 के बुरे असर को कम करने के लिए कदम उठाने होंगे। इसके लिए आपातकाल की शक्तियों की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन ज्यादा शक्ति अगर कम निगरानी के साथ दे दी जाए तो उसमें जोखिम होता है। इसलिए रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे अच्छी प्रतिक्रिया वही होती है, जो तात्कालिक खतरे के अनुपात में हो और मानवाधिकारों की रक्षा करे। इसलिए यह अनिवार्य है कि सरकारें कदम उठाते वक्त लोगों और उनके अधिकारों को केंद्र में रखें। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा है कि कोई भी आपातलकालीन कदम कानूनी रूप से वैध, यथोचित, आवश्यक और भेदभाव से मुक्त चाहिए। उनका एक विशेष फोकस और तयशुदा अवधि होनी चाहिए। साथ ही इन्हें जनता के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए उनके जीवन में सबसे कम दखल देने वाला होना चाहिए। जबकि अभी देखने में यह आया है कि कुछ देशों में बढ़ते नस्ली-राष्ट्रवाद और तानाशाही के बीच मानवाधिकारों को दबाने की कोशिश की जा रही है। यानी महामारी को अलग-अलग उद्देश्यों के लिए दमनकारी कदम उठाने का बहाना बनाया जा रहा है। ये चिंताजनक स्थिति है। अतः कहा जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी सम-सामयिक है।

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