कोरोना की ऐसी मार क्यों?

जब तक कोरोना से चीन पीड़ित था, इस बीमारी का उतना आतंक नहीं था। दहशत तब फैली जब यूरोप में मौतें होने लगीं और अमेरिका भी पीड़ित हो गया। अब हाल यह है कि यूरोप इससे सर्वाधिक पीड़ित है। दुनिया भर में कोविड-19 की चपेट में आ कर हजारों लोगों की जान गई है। दक्षिणी यूरोप कोरोना वायरस की महामारी में बुरी तरह फंस चुका है। अस्पतालों में मरीजों की तादाद बढ़ती जा रही है। इटली के बाद स्पेन भी इस वायरस की चपेट में उलझता जा रहा है। इटली में मरने वालों की संख्या चीन से ज्यादा हो चुकी है। इटली से आ रही तस्वीरें बेहद परेशान करने वाली हैं। दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था के मंदी के दलदल में फंसने का खतरा बढ़ता जा रहा है। आर्थिक गतिविधियां एक तरह से बंद हो गई है। दुनिया भर के एयरपोर्ट पर सन्नाटा है। ज्यादातर एयरलाइनों के विमान खड़े हो गए हैं। कई देशों ने अर्थव्यवस्था को राहत देने के लिए पैकेज का एलान किया है, लेकिन फिलहाल यह संकट कब तक जारी रहेगा इस बारे में कोई कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। विभिन्न देशों की सरकारें लॉकडाउन करती जा रही हैं। इसके बीच जरूरी चीजों की सप्लाई ठहर गई है। इससे लोगों को भारी मुश्किलों से जूझना पड़ रहा है। डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिक्स के साथ ही ट्रक ड्राइवरों, सुपरमार्केट में काम करने वाले लोगों, सफाईकर्मी और पत्रकार अभी भी कार्यरत हैं। आम समझ है कि उनका काम बंद हुआ तो मुश्किल बढ़ जाएगी।

विकसित देशों में ये हाल क्यों और कैसे हुआ, अब बहस इस पर चल रही है। यह तो साफ है कि स्वास्थ्य क्षेत्र का उत्तरोत्तर निजीकरण करना अब विकसित देशों को भारी पड़ रहा है। निजी क्षेत्र ऐसी महामारी के समय बिल्कुल अनुपयोगी है, ये बात इस संकट के दौर में फिर सामने आई है। इसीलिए स्पेन की सोशलिस्ट सरकार ने वहां के तमाम निजी अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण कर लिया। अमेरिका भी इस मुद्दे पर जोरदार बहस चल रही है। अपने को सोशल डेमोक्रेट कहने वाले नेता बर्नी सैंडर्स को इससे फिर से मेडिकेयर फॉर ऑल की अनिवार्यता बताने का मौका मिला है। अब लोग इस बात पर ध्यान भी दे रहे हैं। ऐसी बहस भारत में भी छेड़ने की जरूरत है, ताकि भविष्य में कोरोना वायरस जैसी महामारी के समय अपना समाज असहाय महसूस ना करे।

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