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मुनाफे की हद क्या है?

मुद्दा यह है कि आखिर शोध पर हुए खर्च और आविष्कार के बदले किसी कंपनी और उसके मालिक के मुनाफे का अनुपात क्या होना चाहिए? क्या यह इतना होना चाहिए कि दवा या वैक्सीन का आविष्कार हो जाने के बावजूद उन तक पहुंच ना होने के कारण हजारों लोग मरते रहें?

कंपनियां अपने पेटेंट अधिकारों के बचाव में आविष्कार भावना को बरकरार रखने जैसे तर्क खूब देती हैं। वे शोध खर्च हुए अपने धन का भी हवाला देती हैं। लेकिन मुद्दा यह है कि आखिर शोध पर हुए खर्च और आविष्कार के बदले किसी कंपनी और उसके मालिक के मुनाफे का अनुपात क्या होना चाहिए? क्या यह इतना होना चाहिए कि दवा या वैक्सीन का आविष्कार हो जाने के बावजूद उन तक पहुंच ना होने के कारण हजारों लोग मरते रहें? ये सवाल कोरोना महामारी के दौरान उठे हैं, जो लाजिमी ही है। अब जो जानकारी सामने आई है, उससे इस सवालों की प्रासंगिकता और भी अधिक जाहिर हुई है। दुनिया में सबको कोरोना वैक्सीन मुहैया कराने के मकसद से बने ‘द पीपल्स वैक्सीन अलायंस’ की तरफ से दी गई इस जानकारी पर गौर कीजिए। इसके मुताबिक वैक्सीन से हुए मुनाफे से नौ लोगों को खरबपति बना दिया है। एक रिपोर्ट में अलायंस ने कहा है कि इन नौ लोगों की संपत्ति में 19.3 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है। ये रकम अगर खर्च की जाए, तो तमाम गरीब देशों को जरूरत से 1.3 गुना ज्यादा टीके उपलब्ध हो सकते हैँ। लेकिन इस दिशा में कंपनियों ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। जब लाखों संक्रमित हैं और हजारों रोज मर रहे हैं, तब उनका ध्यान मुनाफा समेटने पर केंद्रित है। अलांयस ने उचित ही ये कहा है कि ये खरबपति उस मुनाफे का चेहरा हैं, जो दवा कंपनियां वैक्सीन पर एकाधिकार के जरिए कमा रही हैं। अलायंस के मुताबिक इन नए बने खरबपतियों के अलावा आठ मौजूदा खरबपतियों की संपत्ति में कुल 32.2 अरब डॉलर यानी करीब 25 खरब रुपये की वृद्धि हुई है। नए खरबपतियों की सूची में सबसे ऊपर दवा कंपनी मॉडर्ना के स्टीफन बैंसल और बायोएनटेक के उगुर साहीन का नाम है। तीन अन्य नए खरबपति चीन की वैक्सीन कंपनी कैनसीनो बायोलॉजिक्स के संस्थापक हैं। ये गौतलब है कि अभी जो बहुत प्रभावशाली वैक्सीन बने हैं, उनमें करदाताओं के पैसे इस्तेमाल हुआ है। इस सूरत में क्या ये जायजा है कि कुछ लोग धन कमाएं और पूरी तरह असुरक्षित करोड़ों लोग दूसरी और तीसरी लहर की चपेट आते रहें? तो सीधा संदेश यह है कि कोरोना वैक्सीन के उत्पादन की राह के तमाम रोड़ों को हटाया जाना चाहिए, जिनमें बौद्धिक संपदा अधिकार यानी पेटेंट भी शामिल हैं। ये उचित ही है कि इसका विरोध करने वालों को कंपनियों के मुनाफे के पक्ष में खड़ा समझा जाएगा।

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