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‘स्वतंत्र’ पत्रकारिता के खतरे

स्वतंत्र पत्रकार मनदीप पुनिया को जमानत मिल गई है। लेकिन उनकी गिरफ्तारी और उन्हें जेल भेजे जाने की घटना से कई अहम सवाल उठ खड़े हुए हैं। ये सवाल मीडिया की आजादी और पत्रकारों के दमन से संबंधित हैं। मनदीप के बचाव पक्ष ने शुरू से कहा कि पुलिस की एफआईआर में कई गंभीर समस्याएं हैं। एफआईआर के मुताबिक कथित मारपीट और खींचतान की घटना और एफआईआर दर्ज होने के बीच करीब सात घंटे देर है। इससे पता चलता है कि एफआईआर दर्ज करने का फैसला बाद में लिया गया। जबकि आरोप पुलिसकर्मियों से मारपीट करने का था। ऐसी घटनाओं में इतनी देर आम तौर पर नहीं होती। पुलिस के मुताबिक सिंघु बॉर्डर पर बीते शनिवार को पुनिया ने सुरक्षा के लिए लगाए बैरिकेड को तोड़कर घुसने की कोशिश की और पुलिस कांस्टेबल को घसीटा। पुलिस का कहना है कि मनदीप ने अपना प्रेस पहचान पत्र भी नहीं दिखाया, जबकि उनके दूसरे साथी को प्रेस कार्ड दिखाने पर जाने दिया गया। लेकिन प्रेसकार्ड न होना मनदीप की गिरफ्तारी का कोई आधार नहीं हो सकता।

भारत में शायद ही किसी स्वतंत्र पत्रकार के पास प्रेस कार्ड होता है। आखिर किसी फ्रीलांस पत्रकार को ऐसा कार्ड कहां से हासिल हो सकता है? मनदीप पुनिया कारवां मैगजीन के लिए काम कर रहे स्वतंत्र पत्रकार हैं। हरियाणा के झज्जर के रहने वाले मनदीप पुनिया ने पंजाब विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है और फिर दिल्ली स्थित भारतीय जन संचार संस्थान से पत्रकारिता का कोर्स किया है। यानी उनके पत्रकार होने पर कोई शक नहीं है। पत्रकार संगठनों ने उचित ही कहा है कि दरअसल यह चिंता की बात पूरे देश के लिए है कि किसी को पुलिस इसलिए उठा ले रही है कि वह सिर्फ अपना काम कर रहा होता है। इस स्थिति में फ्रीलांस पत्रकारों के लिए खतरा कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। जबकि भारत में जमीनी रिपोर्टिंग अक्सर स्थानीय पत्रकार ही करते हैं, जिनके पास कोई स्थायी नौकरी नहीं होती। स्ट्रिंगर कहे जाने वाले पत्रकारों के पास किसी प्रेस-पहचान-पत्र की ढाल नहीं होती। तो क्या उन्हें पुलिस जब चाहे इस आधार पर गिरफ्तार कर सकती है? जहां तक पुलिस के काम में बाधा डालने की बात है, तो जेल भेजने के पहले उसका ठोस साक्ष्य भी जरूर सामने रखा जाना चाहिए। लेकिन आज ये सारी बातें एक तरह से निरर्थक लगती हैं। इसलिए पुलिस जो कर रही है, परोक्ष रूप से उसे सरकार का समर्थन मिला दिखता है।

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