क्या केजरीवाल जवाब देंगे?

फिर वो कहानी शुरू हो चुकी है। और इसके साथ ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का ये दावा ध्वस्त हो चुका है कि दिल्ली की हवा में अब गुणात्मक बदलाव आ गया है। सच्चाई यह है कि दिल्ली प्रदूषण की गिरफ्त में लगातार बनी हुई है। कभी ये शिकंजा अधिक कस जाता है और कभी उतना महसूस नहीं होता। लेकिन अगर दिल्ली के बाहर- खासकर पहाड़ी इलाकों में जाएं तो तुरंत मालूम पड़ जाता है कि दिल्ली की हवा कितनी खराब है। अभी सर्दियां शुरू नहीं हुई हैं। दिवाली भी दूर है। लेकिन दिल्ली स्मॉग की दस्तक महसूस कर चुकी है। सवाल वाजिब है। क्या केजरीवाल ने जल्दबाजी बरती? यह महज कुछ दिन के लिए सुर्खियां बटोर लेने के मोह से वे नहीं बच पाए? गौरतलब है कि केजरीवाल को सितंबर में अपने शहर में आसमान की ओर देखकर इतनी खुशी महसूस की उन्होंने कई बार सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें साझा कीं जिनमें आसमान साफ दिखाई पड़ रहा था।

उन्होंने लिखा कि कई सालों बाद दिल्ली में इस तरह का साफ और नीला आसमान दिखाई दे रहा है। फिर इससे संबंधित आंकड़े साझा किए कि बीता सितंबर पिछले 9 सालों में दिल्ली का सबसे साफ सितंबर था। लेकिन ये खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी। अक्तूबर बुरी खबर ले कर आया। 13 अक्तूबर को शहर में वायु गुणवत्ता का स्तर 270 था, जो खराब श्रेणी में आता है। उसके बाद की सुबहों में शहर के कई इलाकों में प्रदूषण का कोहरा देखा गया। वायु गुणवत्ता के स्तर को कई इलाकों में 235 से ऊपर ही पाया गया। तब केजरीवाल को भी एलान करना पड़ा कि प्रदूषण का स्तर गिरना शुरू हो चुका है। उन्होंने कहा कि दिल्लीवालों को हर साल की तरह इस साल भी एक कठिन समय से गुजरने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। उनकी दिल्ली सरकार पहले ही घोषणा कर चुकी है कि 4 नवंबर से ऑड-इवन योजना लागू होगी। इस बार पिछले साल से सबक लेते हुए योजना के पालन में न्यूनतम छूट दी जाएगी। वायु गुणवत्ता पर काम करने वाली केंद्र सरकार की संस्था सफर के
अनुसार यातायात के धुंए के अलावा बारिश का न होना, पड़ोसी राज्यों से जलती हुई पराली के धुंए का आना, प्रदूषकों को उड़ा ले जाने वाली हवा की गति का कम होना और हवा बहने की दिशा का बदल जाना प्रदूषण के सबसे बड़े कारण हैं। तो इनका क्या उपचार है? और स्थायी इलाज ढूंढने के पहले ही केजरीवाल ने उत्सव मनाना क्यों शुरू कर दिया था?

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