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ठंड और प्रदूषण की मार

चर्चा यह होने लगी थी कि अब उत्तर भारत में पहले जैसी ठंड नहीं पड़ती। उसके साथ ही ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन की बात आती थी। अब हाल यह है कि 2019 का दिसंबर पिछले 118 साल का दूसरा सबसे ठंडा दिसंबर साबित हुआ है। वैसे यह भी जलवायु परिवर्तन का ही असर है। जलवायु परिवर्तन के मतलब ही है कि चरम मौसम होना। फिलहाल, उत्तर भारत में चरम ठंड पड़ रही है। गौरतलब है कि 1901 से 2019 तक सिर्फ चार बार दिसंबर का अधिकतम औसत तापमान 20 डिग्री से नीचे गया है। दिल्ली में इस साल 26 दिसंबर तक अधिकतम औसत तापमान 19.85 डिग्री रहा। उसके बाद ठंड और बढ़ गई। दिल्ली में इस बार शीतलहर ऐतिहासिक है। मौसम विभाग के मुताबिक इससे पहले 1919, 1929, 1961 और 1997 में ही ऐसा हुआ है, जब दिसंबर महीने का अधिकतम औसत तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से कम रहा हो। 1997 के 17.3 डिग्री अधिकतम औसत तापमान रहा था। उसके बाद यह दूसरा मौका है जब दिसंबर में इतनी सर्दी पड़ी।

दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 20 दिसंबर से सर्द दिन और शीतलहर का प्रकोप जारी है। नए साल की शुरुआत में हल्की बारिश और ओलावृष्टि की भी संभावना जताई गई। अनुमान है कि अगले चार दिनों तक शीतलहर से राहत नहीं मिलेगी। मौसम विभाग के मुताबिक उत्तर पश्चिमी हवाएं लगातार दिल्ली की तरफ आ रही हैं और ऊपरी सतह पर बादल छाए हुए हैं। उसकी वजह से धूप धरती तक नहीं पहुंच पा रही है और इसी के चलते दिन में ठंड कम नहीं हो रही है। सर्द मौसम में ऐसे लोगों की मुसीबत और बढ़ जाती है जिनके पास सिर छिपाने को छत नहीं है। दिल्ली में सरकार बेघरों के रहने के लिए रैन बसेरों की व्यवस्था करती है, हालांकि ठंड की वजह से इन रैन बसेरों में बेघरों की अत्यधिक भीड़ हो जाती है और सुविधाओं का अभाव हो जाता है। कड़ाके की ठंड के बीच लोग प्रदूषण से भी परेशान हैं। पिछले कुछ दिनों से दिल्ली-एनसीआर में अधिकतर जगहों पर प्रदूषण बहुत खराब श्रेणी में बना हुआ है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मुताबिक हवा की रफ्तार कम होने की वजह हवा की गुणवत्ता और खराब होने की संभावना है। आशंका है कि आने वाले दिनों में एयर क्वॉलिटी इंडेक्स और बिगड़ सकता है।

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