बड़े बदहाल डिटेंशन सेंटर्स

अभी कुछ समय पहले ये सवाल उठा था कि देश में डिटेंशन सेंटर हैं या नहीं। सवाल प्रधानमंत्री के एक भाषण से उठा। मगर जल्द ही ये साफ हो गया कि प्रधानमंत्री का बयान भ्रामक था। अब तो केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने संसद में पुष्टि कर दी है कि ना सिर्फ डिटेंशन सेंटर हैं, बल्कि उनमें मौतें भी हुई हैं। रेड्डी के मुताबिक बीते चार वर्षों के दौरान इन सेंटरों में बीमारियों की वजह से 26 लोगों की मौत हो गई। एक अन्य गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने यही आंकड़ा राज्यसभा में दिया था। इन मंत्रियों के इन बयानों से पता चलता है कि इन डिटेंशन सेंटरों में हालात बेहद अमानवीय हैं। असम में विदेशी घोषित लोगों के लिए बने इन डिटेंशन सेंटरों की बदहाली का जिक्र पहले भी होता रहा है। अब जबकि सरकार ने उच्च सदन में इन मौतों की बात स्वीकार की है, फिर सवाल उठने लाजिमी हैं। गृह राज्य मंत्री रेड्डी ने बताया कि राज्य के छह डिटेंशन सेंटरों में इस साल 27 फरवरी तक 799 लोग रह रहे थे। इनमें से 95 लोग तीन साल या उससे ज्यादा समय से वहां रह रहे हैं। नित्यानंद राय के मुताबिक बीते नवंबर तक इन सेंटरों में 1043 विदेशी रह रहे थे। तीन साल की हिरासत की अवधि पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक कई लोगों को रिहा किया गया।

बहरहाल, मुद्दा यह है कि असम के डिटेंशन सेंटरों की हालत में सुधार पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। बीते साल के आखिर में लगातार तीन लोगों की मौत पर उभरे विवाद के बाद राज्य सरकार ने एक जांच समिति का गठन जरूर किया था, लेकिन अब तक उसकी रिपोर्ट सामने नहीं आई है। दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि डिटेंशन सेंटरों को लेकर सरकार के पास कोई ठोस और पारदर्शी नीति नहीं है। इसी का परिणाम है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद कई लोग लंबे अरसे अमानवीय हालात में वहां रह रहे हैं। अब एनआरसी से बाहर रहे 19 लाख से ज्यादा लोगों को कहां रखा जाएगा, इस सवाल का भी सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने बीते महीने असम के डिटेंशन सेंटर्स को लेकर केंद्र से जानकारी मांगी थी। उस पर सरकार के जवाब का इंतजार है। फिलहाल, यही सच सामने है कि इन सेंटर्स की हालत बेहद चिंताजनक है।

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