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काश ये अपवाद ना होता!

पर्यावरणवादी कार्यकर्ता दिशा रवि की जमानत पर उचित ही है कि देश के एक बड़े हलके में राहत महसूस की गई है। उससे भी राहत उन बातों से महसूस की गई है, जो फैसले के साथ जज धर्मेंद्र राणा ने कही। लेकिन अगर ये सामान्य दौर होता, तो उन बातों को उतने ही सामान्य ढंग से लिया जाता। आखिर जज ने वही बातें कहीं, जो आधुनिक न्याय प्रक्रिया का आधार हैं। उन्होंने वही फैसला दिया, जो हमारे संविधान की भावना के अनुरूप दिया जाना चाहिए। लेकिन आज अगर ये फैसला और जज की टिप्पणियां अपवाद या असाधारण मालूम पड़ती हैं, तो इससे ही जाहिर होता है कि हम कैसे समय में जी रहे हैं। ये वो समय है, जिसमें दिशा रवि को तो जमानत मिल गई, लेकिन नोदीप कौर जेल हैं, कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी को जमातन मिली, लेकिन उनके साथ गिरफ्तार हुए उनके सहयोगी जेल में हैं, नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलन के सिलसिले में पकड़े गए अनगिनत युवा जेलों में हैं, भीमा कोरेगांव मामले में पकड़े गए सामाजिक कार्यकर्ता बिना मुकदमे की कार्यवाही को आगे बढ़ाए जेलों में रखे गए हैं।

ये सूची काफी लंबी हो सकती है। इसलिए एक अपवाद की तारीफ उचित है, लेकिन उससे संतोष करने की कोई वजह नहीं मिलती। हकीकत यह है कि मानव अधिकार कार्यकर्ता, छात्र नेताओं और खासकर अल्पसंख्यक समुदाय के लोग लगातार निशाना बने हुए हैं। उन पर सिर्फ इसलिए मामला दर्ज किया गया है, क्योंकि वे लोग सरकार से असहमत हैं या लगातार सरकार से सवाल पूछ रहे थे। मुद्दा यह है कि ल छात्र और युवा कार्यकर्ताओं का ये उत्पीड़न क्यों किया जा रहा है? जाहिर है, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने देश का नागरिक होने के नाते चुप रहने के बजाय बोलने को चुना, जो उनका संवैधानिक हक है। दिशा रवि को जमानत देते हुए जज राणा ने कहा कि मामले की अधूरी और अस्पष्ट जांच के मद्देनजर उन्हें ऐसा कोई ठोस कारण नजर नहीं आता, जिसके चलते 22 साल की एक लड़की को जमानत ना दी जाए, जिसका अपराध का कोई पूर्व-इतिहास नहीं है। अगर बाकी मामलों में भी यही न्यायिक कसौटी अपनाई जाए, तो स्पष्टतः जमानत ना दिए जाने का कोई आधार नहीं होगा। आखिर गिरफ्तार तमाम लोग सामाजिक कार्यकर्ता हैं, कोई पेशेवर अपराधी नहीं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि दिशा का मामला फिलहाल एक अपवाद ही दिखता है।

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