पश्चिम एशिया में कामयाब

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के बारे में बाकी आकलन चाहे जो हो, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पश्चिम एशिया में उन्हें एक हद तक सफलता मिली है, हालांकि उसका वास्तविक असर क्या होगा, इस पर कई सवाल हैं। वहां इजराइल के साथ खाड़ी देशों की बढ़ती नजदीकियों को अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की बड़ी कामयाबी माना जा रहा है। इसके लिए नॉर्वे के एक सांसद ने तो ट्रंप का नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी भेज दिया है। उनका कहना है कि ट्रंप देशों के बीच शांति कायम कर रहे हैं। लेकिन एक तथ्य और भी है। इलाके पर नजर रखने वाले जानकारों के मुताबिक जिन देशों के बीच शांति कायम करने का श्रेय ट्रंप ले रहे हैं, उनके बीच कभी युद्ध नहीं हुआ। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) अमेरिका का नजदीकी सहयोगी रहा है। उसने कभी इजराइल से कोई युद्ध नहीं लड़ा। इजराइल के साथ राजनयिक संबंध कायम करने की औपचारिक घोषणा यूईए ने भले ही अब की हो, लेकिन ईरान के खिलाफ बने गठबंधन में तो यूईए इजराइल के साथ कई साल से अनौपचारिक सहयोग कर रहा है। अब नई डील होने के बाद यूईए को अत्याधुनिक अमेरिकी हथियार मिलने का रास्ता साफ हो गया है। यूएई के बाद बहरीन ने भी इजराइल के साथ राजनयिक संबंध कायम करने को हरी झंडी दिखाई है।

बहरीन के फैसले के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सऊदी अरब भी जल्द ऐसा कदम उठाएगा? ऐसा होता है तो वह इजराइल के लिए शायद सबसे बड़ी जीत होगी। बहरीन के सुन्नी शासकों के सऊदी अरब से नजदीकी रिश्ते रहे हैं। यूएई और इजराइल के बीच समझौते को भी सऊदी अरब का मूक समर्थन रहा है। ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि इजराइल के साथ ज्यादा से ज्यादा देश अपने रिश्ते सामान्य करेंगे, तो इससे फिलस्तीनियों पर शांति वार्ता में लौटने का दबाव बढ़ेगा। ये वार्ता बीते दस साल से अटकी पड़ी है। पिछले तीन साल में ट्रंप ने फिलस्तीनियों को दी जाने वाली मदद में कटौती कर दी थी, यरुशलम को इजराइल की राजधानी के तौर पर मान्यता दी, इजराइली बस्तियों पर अमेरिका की लंबे समय से चले आ रही आपत्तियों को छोड़ दिया और मध्य पूर्व के लिए ऐसी योजना तैयार की जिसमें खुले तौर पर इजराइल का पक्ष लिया गया। अब ट्रंप उसी योजना को अपने प्रभाव का इस्तेमाल आगे बढ़ा रहे हैं।

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