बेलगाम होती गैर-बराबरी

दुनिया में आर्थिक गैर-बराबरी का हाल यह है कि संकट का समय भी धनवान लोगों के लिए अवसर बनने लगा है। लोकतांत्रिक देशों में इस वक्त जो राजनीतिक उथल-पुथल है, उसके पीछे इस परिघटना का बड़ा रोल है। इसके बावजूद उन देशों में इस समस्या को कैसे हल किया जाए, इसको लेकर कोई सहमति नहीं बनी है। ताजा खबर यह है कि जर्मन कंपनी पीडब्ल्यूसी और स्विस बैंक यूबीएस की कंसल्टिंग फर्मों का एक रिसर्च जारी हुआ है। उससे यह बात सामने आई है कि कोरोना महामारी के दौरान दुनिया भर के अरबपति पहले से भी ज्यादा अमीर हो गए हैं। जुलाई के अंत में दुनिया के दो हजार से भी ज्यादा अरबपतियों की संपत्ति रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच कर दस हजार करोड़ डॉलर से भी ज्यादा हो गई। 2017 में यह नौ हजार करोड़ डॉलर से भी कम थी। उस समय यह रिकॉर्ड संख्या थी। 2018 और 2019 में यह कम होती गई। लेकिन 2020 में महामारी के दौरान अरबपतियों को एक बार फिर खूब मुनाफा होता देखा गया है।

इस स्टडी के अनुसार स्टॉक मार्केट में बेहतरी इसकी एक वजह है और दूसरी वजह तकनीक और स्वास्थ्य सुविधाओं में ज्यादा निवेश है। दुनिया भर में कुल 2,189 ऐसे लोग हैं, जिनकी संपत्ति एक अरब डॉलर से अधिक है। संपत्ति का मूल्यांकन करने के लिए बैंक अकाउंट, प्रॉपर्टी, लग्जरी सामान इत्यादि का हिसाब जोड़ा जाता है। किसी भी तरह के कर्ज को कुल मूल्य में से हटा लिया जाता है। अकेले जर्मनी में जुलाई के अंत में अरबपतियों की संपत्ति करीब 595 अरब डॉलर तक पहुंच गई थी। हालांकि कोरोना काल की शुरुआत में इन लोगों ने भी घाटा झेला था। इसके अलावा एक अरब डॉलर से अधिक संपत्ति रखने वालों की तादाद देश में 114 से बढ़ कर 119 हो गई। यूबीएस और पीडब्ल्यूसी पिछले 25 साल से अरबपतियों की दौलत का हिसाब रख रहे हैं। इस दौरान दुनिया भर के रईसों की दौलत में पांच से दस गुना का इजाफा देखा गया है। 25 साल पहले जहां सभी अरबपतियों की संपत्ति मिला कर मात्र एक हजार करोड़ डॉलर की थी, अब वह दस हजार करोड़ डॉलर की हो चुकी है। इस ट्रेंड का दुनिया भर में पोपुलिज्म का दौर लाने में बड़ी भूमिका रही है। पॉपुलिस्ट नेताओं ने इसका जिक्र कर पिछड़ रहे लोगों का समर्थन हासिल किया है। उसका परिणाम है कि आज कई देशों में लोकतंत्र के सामने कठिन चुनौतियां पैदा हो गई हैँ।

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