अर्थव्यवस्था की बढ़ती बदहाली

कुछ समय पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चेतावनी दी थी कि देश स्टैगफलेशन की तरफ बढ़ रहा है। स्टैगफलेशन उस स्थिति को कहा जाता है, जब जीडीपी की वृद्धि दर गिरे और मुद्रास्फीति की दर बढ़ती हुई उससे ज्यादा हो जाए। अब भारत में यही हालत पैदा हो गई है। दिसंबर 2019 में देश में खुदरा महंगाई की दर 7.35 फीसदी रही, जो पिछले पांच सालों का सबसे ऊंचा स्तर है। यह भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से मुद्रास्फीति की तय 6 फीसदी की सीमा से ज्यादा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक महंगाई जिन कारणों से एक दशक पहले बढ़ती थी, वही वजहें अब भी महंगाई बढ़ा रही हैं। खुदरा महंगाई दर के 7.35 फीसदी पहुंचने के लिए मुख्य तौर पर सब्जियों की कीमतें जिम्मेदार हैं, जिनकी महंगाई की दर 60.50 फीसदी रही है। नवंबर में खुदरा महंगाई दर 5.54 फीसदी थी, जबकि दिसंबर 2018 में सिर्फ 2.11 फीसदी थी। गौरतलब है कि जीडीपी वृद्धि दर के बारे में अब आम अनुमान है कि यह इस वित्त वर्ष में पांच फीसदी से नीचे रहेगी। ये पांच फीसदी की आंकड़ा भी विवादास्पद है, क्योंकि अनेक अर्थशास्त्री इसे बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया आंकड़ा मानते हैं। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक केंद्र सरकार के सामने अब दो मुख्य चुनौतियां हैं- बढ़ती कीमतों को काबू करना और आर्थिक विकास दर में तेजी लाना। जानकारों के मुताबिक सरकार के लिए यह दोनों काफी बड़ी चुनौती हैं, जिससे निपटना उसके लिए आसान नहीं होगा। दरअसल, अब तक सरकार ने महंगाई और आर्थिक सुस्ती को गंभीरता से लिया ही नहीं है। महंगाई आज इस कदर बढ़ गई है कि जिन गांवों में अनाज और सब्जियां पैदा होती हैं, उन्हीं गांवों के किसानों को आज खाद्य सामग्री खुदरा कीमत पर खरीदकर खाना पड़ रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के कारण कच्चा तेल अलग से महंगा हो रहा है, जो आने वाले दिनों में चिंता और बढ़ा सकता है। इन स्थितियों ने अगले बजट के लिए चुनौतियां बढ़ा दी हैं, जो एक फरवरी को पेश होगा। तब वित्त मंत्री की जिम्मेदारी होगी कि बजट में ऐसे क्षेत्र में फंडिंग बढ़ाएं जहां विकास और क्रय बढ़ने की संभावना ज्यादा हो। मगर राजकोषीय सेहत भी अच्छी नहीं है। ऐसे में सरकार कैसे अर्थव्यवस्था को संभालेगी, यह प्रश्न लगातार गंभीर होता जा रहा है। उससे भी बड़ा प्रश्न है कि क्या सरकार को इन स्थितियों से थोड़ी भी चिंता है?

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