आखिर हासिल क्या होगा

यूरोपीय संसद का दल भारत आया है। किसने बुलाया और किस मकसद से यह नहीं मालूम। इसलिए कि यूरोपीय यूनियन ने उनके इस दौरे से पल्ला झाड़ लिया। फिर खबर आई कि ये सभी सांसद धुर दक्षिणपंथी पार्टियों से संबंध रखते हैं। तो ये सवाल उठा है कि क्या उनकी यात्रा यूरोपीय देशों के उदारवादी दलों और समूहों में एक नकारात्मक संदेश नहीं देगी? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इन सांसदों के जम्मू-कश्मीर दौरे से जम्मू, कश्मीर और लद्दाख की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता के बारे में प्रतिनिधिमंडल की समझ बेहतर होनी चाहिए। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि यूरोपीय संघ के सांसदों का दौरा दूसरे लोगों के लिए भी कश्मीर के दरवाजे खोलेगा। मगर विपक्षी दलों के नेताओं ने सरकार के इस कदम की आलोचना की है। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने इसे भारतीय संसद का अपमान कहा। पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने पूछा कि जब यूरोपीय सांसदों को कश्मीर आने और यहां की स्थिति का जायजा लेने की अनुमति है, तो हैरानी है कि अमेरिकी सांसदों को इससे क्यों दूर रखा गया। गौरतलब है कि इसी महीने कुछ अमेरिकी सांसदों ने राजनयिकों और विदेशी मीडिया के कश्मीर जाने में असहजता को लेकर चिंता जताई थी। अब भारतीय अधिकारियों के मुताबिक यूरोपीय प्रतिनिधिमंडल भारतीय अधिकारियों और स्थानीय लोगों से मुलाकात कर वहां के जमीनी हालात का जायजा लेगा। इस बीच भारत सरकार कश्मीर में स्थिति के सामान्य होने की तरफ बढ़ने की बात कहती रही है।

मगर हकीकत शायद ऐसी नहीं है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक वहां सड़कों पर अब भी चहल-पहल नहीं दिखाई देती। दुकानें सुबह और शाम को थोड़ी देर के लिए खुलती हैं। बाकी समय सन्नाटा पसरा रहता है। कुछ इलाकों में स्कूल खोले गए हैं लेकिन वहां छात्रों की संख्या नाम मात्र की ही है। इस बीच पिछले हफ्ते स्थानीय निकायों के भी चुनाव करा लिए गए। अलगाववादियों ने इन चुनावों को जहां महज खानापूर्ति कहा। वहीं भारत सरकार का दावा है कि इससे विकास के कामों में तेजी आएगी और भ्रष्ट नेताओं को इस प्रक्रिया से दूर रखा जा सकेगा। अब भारत सरकार उम्मीद कर रही होगी कि यूरोपीय सांसदों के दौरे से वह दुनिया को वैसी कहानी बता सकेगी, जैसा वह बताना चाहती है। लेकिन मुश्किल यह है कि पश्चिमी मीडिया की रिपोर्टिंग भारत के अनुकूल नहीं है। फिर भारत आए सांसदों की छवि का भी सवाल है।

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