माली मुश्किलों का दस्तावेज - Naya India
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माली मुश्किलों का दस्तावेज

आर्थिक सर्वेक्षण से आर्थिक क्षेत्र में बदहाली को जो तस्वीर उभरी थी, बजट ने उसकी और पुष्टि कर दी। या इसे ऐसे कहा जा सकता है कि देश की माली हालत जिस बदहाली में पहुंच गई है, उससे निकालने का कोई रोड मैप पेश करने में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन नाकाम रहीं। उलटे भारतीय जीवन बीमा निगम में सरकारी हिस्सेदारी बेचने जैसी घोषणाओं ने नई आशंकाएं पैदा कर दी हैं। मगर असली समस्या यह है कि सरकारी खजाने का घाटा अनियंत्रित हो गया है। नतीजतन, राजकोषीय दायित्व एवं प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम) के तहत तय राजकोषीय घाटे के लक्ष्य की उलटी दिशा में चलने को सरकार मजबूर हो गई है। चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद के 3.3 प्रतिशत तक इस घाटे को रखने का लक्ष्य सरकार हासिल नहीं कर पाई। अब सरकार ने खुद मान लिया है कि ये घाटा 3.8 प्रतिशत रहेगा। अगले साल भी इसे 3.5 फीसदी तक ही लाने का लक्ष्य वह रख पाई, जबकि पहले इसे तीन फीसदी तक लाने का लक्ष्य था। इसके पहले 2019-20 वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण प्रस्तुत करने के बाद केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने कहा था कि इसका मूल विषय है संपत्ति का सृजन। यह कैसे होगा, इसके रोडमैप की उम्मीद बजट से थी। मगर ऐसा कोई रोडमैप सामने आ नहीं सका। बहरहाल, 2019-20 के पहले छह महीनों में आर्थिक विकास की दर गिर कर 4.8 प्रतिशत पर आ गई है। जाहिर है कि यह सरकार का पूर्वानुमान है कि साल के आखिरी छह महीनों में विकास दर में वृद्धि हुई होगी, जिसकी वजह से पूरे साल की विकास दर 5 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया है। मगर ये अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर नहीं है। जानकारों का कहना है कि ताजा तस्वीर ने इसी सरकारी टीम द्वारा जुलाई 2019 में प्रस्तुत किए गए आर्थिक सर्वेक्षण को भ्रामक साबित कर दिया है। इस सर्वेक्षण ने ये माना है कि इस साल विकास दर दो अंकों में नहीं जाने वाली है। अगर महंगाई दर और बढ़ी तो विकास की ये दर भी महंगाई की वजह से होगी। इसका मतलब है कि चाहे वित्तीय घाटे का आंकड़ा हो या आमदनी का- सभी आंकड़ों को इसी रोशनी में देखा जाएगा कि अगला साल संकट का साल है। यानी विकास दर के इन आंकड़ों का मतलब ये है कि सरकार असलियत को अस्वीकार कर रही है। पिछले कुछ महीनों में विकास दर लगातार गिरती रही है और अभी वो 4.5 प्रतिशत से भी कम है।

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