जर्मनी की अहम पहला

जर्मनी ने हाल में एक अहम पहल की है। इससे भारत और जर्मनी के संबंध एक नए मुकाम पर पहुंच सकते हैं। जर्मनी ने एक हालिया दस्तावेज में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को लेकर अपनी प्राथमिकताओं और नीतियों पर भी प्रकाश डाला है। जर्मन सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल इंडो-पैसिफिक के समर्थक देशों में इस क्षेत्र की भौगोलिक सीमाओं को लेकर आम राय नहीं बनी है, लेकिन जर्मनी हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच के क्षेत्र को इंडो-पैसिफिक का नाम अपना रहा है। इस घोषणा के साथ ही जर्मनी इंडो-पैसिफिक नाम को अपनाने वाला यूरोप का दूसरा देश बन गया है। इससे पहले फ्रांस ने भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को अपनी सामरिक और विदेश नीति के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए विदेश नीति में समुचित बदलाव लाने की घोषणा की थी। हालांकि फ्रांस की तरह जर्मनी इंडो-पैसिफिक का सीधे तौर पर तो हिस्सा नहीं है, लेकिन इसके व्यापारिक, आर्थिक, और सामरिक हित इंडो-पैसिफिक से सीधे तौर पर जुड़े हैं।

जर्मनी के इस निर्णय में चीन के पहलू की झलक साफ देखने को मिलती है। परोक्ष रूप से चीन की दक्षिण चीन सागर और अन्य क्षेत्रों में बढ़ती गतिविधियों का भी जिक्र है। जर्मनी के इस कदम से चीन के नाराज होने की संभावना तो है, लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में यह कदम जरूरी भी लगता है। चीन को लेकर जर्मनी की चिंताएं आर्थिक और सामरिक दोनों स्तरों पर हैं। गहन व्यापार और निवेश संबंध होने के बावजूद जर्मनी को लगने लगा है कि चीन के साथ आर्थिक संबंधों में उसे उतना फायदा नहीं हो पाया है, जितनी उम्मीद थी। इसीलिए जापान और अमेरिका की तर्ज पर संभवतः जर्मनी भी अपने निवेश और व्यापार संबंधों में विविधता लाने की कोशिश करेगा। चीन के अलावा जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, वियतनाम और आसियान के अन्य देशों और भारत की अर्थव्यवस्थाओं के पिछले कुछ सालों में विकसित होने से आज अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की धुरी एशिया की ओर झुकती दिख रही है। दस-सदस्यीय आसियान के साथ तो जर्मनी के आर्थिक और निवेश संबंध मजबूत रहे ही हैं। 40 पन्नों की अपनी रणनीति में जर्मनी ने भारत के साथ भी आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। दरअसल, बदलती विश्व व्यवस्था में जर्मनी एक सक्रिय और सकारात्मक भूमिका अदा करना चाहता है और इंडो-पैसिफिक रणनीति इसी का एक हिस्सा है।

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