भारत दुविधा में क्यों?

गलवान घाटी की घटना के बाद चीन ने अपना रुख और सख्त कर दिया है। बल्कि पिछले हफ्ते तो चीन के विदेश और रक्षा मंत्रालयों- दोनों ने एक साथ भारत पर निशाना साधा। उन्होंने गलवान वैली में 15 जून को हुई हिंसक वारदात के लिए भारत को दोषी ठहराया। साथ ही भारत पर द्विपक्षीय समझौतों और अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करने और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर टकराव पैदा करने का इल्जाम लगाया। हैरत इस बात पर हुई कि इन बयानों का जवाब देने में भारत ने 24 घंटों से भी ज्यादा समय लगा दिया। आखिरकार जब जवाब आया भी, तो उससे सिर्फ एक संकेत मिला कि गलवान वैली और दूसरी जगहों पर चीनी घुसपैठ को भारत ने स्वीकार नहीं किया है। हालांकि इसके पहले प्रधानमंत्री के बयान से जो भ्रम पैदा हुआ, वह पूरी तरह छंटा नहीं है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारतीय जमीन पर ना तो कोई घुस आया है, और ना ही कोई घुसा हुआ है। बहरहाल, भारतीय विदेश मंत्रालय ने आखिरकार एक लंबा वक्तव्य जारी किया। उसमें चीन को चेतावनी दी गई कि मौजूदा स्थिति अगर ऐसी ही रही तो इससे दोनों देशों के बीच के रिश्तों को नुकसान होगा।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि मुद्दे के केंद्र में मामला यह है कि मई की शुरुआत से ही चीन की तरफ से वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ साथ सैनिकों की एक बड़ी टुकड़ी और हथियारों की तैनाती हो रही है। यह 1993 के बाद से दोनों देशों के बीच हुए समझौतों के अनुकूल नहीं है। मंत्रालय ने चीन के सैनिकों द्वारा भारतीय सैनिकों की गश्त में अवरोध पैदा करने की निंदा की। कहा कि ये उन सभी मानकों का पूरी तरह से अनादर है, जिन पर दोनों देशों के बीच सहमति रही है। मगर इन बातों का चीन पर कोई असर नहीं हुआ है। बल्कि उसके बयान और जमीनी गतिविधियों से साफ है कि वह भारतीय जमीन पर हालिया कब्जे को खाली करने के मूड में नहीं है। बल्कि उसने वहां स्थायी निर्माण शुरू कर दिए हैं। भारतीय बयान के बाद एक भारतीय समाचार एजेंसी को दिए साक्षात्कार में भारत में चीन के राजदूत सून वीडॉन्ग ने कहा कि इस स्थिति की जिम्मेदारी चीन पर नहीं है, क्योंकि चीनी सिपाहियों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा कभी पार ही नहीं की। जाहिर है, चीन जहां तक आ गया है, उसे अपना क्षेत्र बता रहा है। भारत इस स्थिति पर दुविधाग्रस्त दिखता है। इसका फायदा चीन उठा रहा है।

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