आखिर वार्ता से गुरेज क्यों? - Naya India
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आखिर वार्ता से गुरेज क्यों?

यह रहस्यमय है कि नेपाल के साथ सीमा विवाद पर बातचीत करने में भारत ने दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई? गौरतलब है कि ये विवाद खड़ा होते ही नेपाल ने बातचीत की अपील की। लेकिन भारत ने यह कह कर इसे टाल दिया कि अभी कोरोना संकट है, जिसमें देश उलझा हुआ है। इस संकट के बाद ही बातचीत होगी। लेकिन अगर बातचीत हो गई होती, तो मुमकिन है कि नेपाल अपने नए नक्शे को संसद से मंजूरी दिलाने की तरफ नहीं बढ़ता। इस नक्शे में भारत के कई क्षेत्रों को नेपाल का बताया गया है। वार्ता का प्रस्ताव ठुकरा कर दरअसल भारत ने नेपाल को अधिक सख्त रुख की तरफ धकेल दिया। कोरोना संकट का तर्क इसलिए अजीब लगता है कि इसी दौर में भारत ने ऑस्ट्रेलिया से द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की है। और जब चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन कर भारतीय इलाके में अपनी फौज जमा दी, तो भारत ने फिर बातचीत की राह अपनाई। नेपाल ने इन दो वार्ताओं की तरफ ध्यान खींचते हुए भारत पर दोहरा मानदंड अपनाने का आरोप लगाया। और उसके बाद वह नक्शा पास कराने की तरफ बढ़ गया। इसके लिए संविधान संशोधन बिल को संसद ने मंगलवार को को मंज़ूरी दे दी। अब यह संविधान संशोधन विधेयक राष्ट्रपति बिध्या देवी भंडारी के अनुमोदन के लिए भेजा जाएगा। उनके हस्ताक्षर के बाद यह क़ानून बन जाएगा। नेपाली संसद ने सर्व सम्मति से इस विधेयक को मंजूरी दी।

विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावली ने कहा कि नेपाल ने इस मुद्दे को कूटनीतिक तरीक़े से सुलझाने की कोशिश की, लेकिन भारत ने इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्होंने कहा, “हम थोड़े सदमे में हैं, क्योंकि सीमा विवाद को बातचीत से सुलझाने के हमारे प्रस्ताव का कोई जवाब नहीं मिला। अगर भारत और चीन अपने मसले सुलझा सकते हैं, तो ऐसा कोई कारण नहीं है कि नेपाल और भारत ऐसा ना कर सकें। हमें उम्मीद है कि बहुप्रतीक्षित बातचीत जल्दी ही आएगी।” इस बिल का संदर्भ हाल में उठा विवाद है। दक्षिणी नेपाल में सुस्ता है, जहां दो नदियां सीमा बनाती हैं। सीमा स्थल पर लिपुलेख-लिम्पियाधुरा को लेकर भारत और नेपाल के बीच गतिरोध है। नेपाल ने एक बार फिर भारत से विदेश सचिव स्तर पर वीडियो कॉन्फ्रेंस के तहत बात करने का अनुरोध किया है, ताकि दोनों के बीच विश्वास बने। क्या यह उचित नहीं होगा कि इस बार भारत ये प्रस्ताव स्वीकार कर ले?

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