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आईएमएफ की चेतावनी गंभीर

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत सरकार से तुरंत कदम उठाने को कहा है, ताकि देश में आर्थिक गिरावट के प्रभावों से निपटा जा सके। मगर उससे ज्यादा चिंता की बात उसका भारत में जीडीपी की गणना के तरीके पर सवाल उठाना है। यह साफ है कि अगर भारत ने इस सवालों पर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया, तो पहले से ही शक से घिरे देश के आर्थिक आंकड़े और अधिक संदिग्ध हो जाएंगे। किसी देश और उसकी अर्थव्यवस्था के लिए इससे अधिक हानिकारक और कुछ नहीं हो सकता कि उसके आंकड़े संदिग्ध हो जाएं। बहरहाल, अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अब इस निष्कर्ष पर है कि घटती खपत, निवेश और टैक्स से होने वाले आमदनी में आई कमी ने कुछ और कारणों के साथ मिल कर भारत की आर्थिक वृद्धि को रोक दिया है। ईएमएफ की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि लाखों लोगों को गरीबी से निकालने के बाद भारत अब एक महत्वपूर्ण आर्थिक मंदी की चपेट में है। मौजूदा आर्थिक गिरावट की रोकथाम करने और भारत को ऊंची विकास दर के रास्ते पर वापस लाने के लिए तुरंत नीतिगत कदम उठाए जाने के जरूरत है”।  आईएमएफ ने चेतावनी भी दी है कि सरकार के पास विकास के लिए खर्च बढ़ाने की गुंजाइश सीमित है। विशेषकर ऋण और ब्याज भुगतान के बढ़े हुए स्तर को देखते हुए ऐसा करना आसान नहीं होगा। आईएमएफ की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने पिछले दिनों कहा था कि भारत में चौंकाने वाले तरीके से और गंभीर हो गई है और आईएमएफ अगले महीने जारी होने वाले वैश्विक आर्थिक आउटलुक के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के अनुमानों को कम करने जा रहा है। अक्तूबर में आईएमएफ ने 2019 के पूर्वानुमान को लगभग एक पूरे अंक के बराबर गिरा कर उसे 6.1 प्रतिशत पर ला दिया था। तब 2020 के आउटलुक को गिरा कर उसने 7.0 प्रतिशत पर ला दिया था। आईएमएफ की राय है कि भारत के केंद्रीय बैंक यानी आरबीआई के पास नीतिगत दरों को और गिराने की गुंजाइश है। खासकर अगर मंदी बनी रहती है तो ऐसा करना पड़ेगा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई-सितंबर अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर छह सालों में सबसे धीमी रही। इस अवधि में वृद्धि दर 4.5 प्रतिशत रही, जब कि ठीक एक साल पहले यह सात प्रतिशत थी। अतः आईएमएफ का मानना है कि सरकार को सुधारों के एजेंडा को पुनर्जीवित करने की जरूरत है, जिसमें वित्तीय क्षेत्र के स्वास्थ्य को ठीक करना भी शामिल है।

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