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ईरानः महिलाओं से जारी बेरहमी

सिर्फ इसी महीने ईरान से तीन महिलाओं की बेरहमी से हत्या की खबर आई है। गौरतलब है कि इन सभी मामलों में हत्यारे पिता, पति या भाई जैसे करीबी लोग थे। सभी हत्याएं तथाकथित “इज्जत बचाने” के लिए की गईं। उल्लेखनीय यह भी है कि इनमें से किसी भी हत्यारे को अपराध साबित होने पर भी किसी आम हत्यारे जैसी सजा नहीं मिलेगी। ईरान के कानून की यही व्यवस्था है। शरिया कानून के तहत “ऑनर किलिंग” जैसे मामलों में बेटी की हत्या के लिए पिता को मृत्यु दंड या उम्र कैद नहीं दी जा सकती। लेकिन यह भी ध्यान दीजिए कि ऐसे ही जुर्म में मां को कठोरतम सजा मिल सकती है। उम्मीद की किरण सिर्फ यह है कि देश के राजनीतिक मंचों और सोशल मीडिया पर तथाकथित सम्मान के नाम पर की जाने वाली ऐसी हिंसा की आलोचना अब देखने को मिलने लगी है। ईरान के इस्लामिक कानून में सुधारों की मांग को लेकर कई नागरिक अधिकार कार्यकर्ता काम करते आए हैं। उनकी मांग रही है कि किसी के खून के लिए हर खूनी को एक जैसी सजा मिलनी चाहिए।

मगर घरेलू हिंसा को अपराध का दर्जा दिए जाने के कानून सुधार करने की तैयारी आठ साल से चल रही है, लेकिन अब तक उस पर सहमति नहीं बनी है। हत्याओं की इस ताजा शृंखला पर छिड़ी देशव्यापी चर्चा के बाद जल्दी-जल्दी में देश में वो कानून पास किया गया, जो पिछले 11 साल से लटका था। यह कानून बच्चों के अधिकारों से जुड़ा था, जिसे लेकर ईरानी संसद की ताकतवर और रूढ़िवादी सोच वाली गार्डियन काउंसिल और दूसरे सुधारवादी धड़े के बीच सहमति नहीं बन पाई थी। लेकिन हत्याकांड के बाद बने दबाव के कारण पास हुए इस कानून में भी वो शर्त नहीं बदली जा सकी कि बच्चों को जान से मारने वाले पिता को आम खूनी की तरह सजा नहीं दी जाएगी। इसका कारण यह है कि यह इस्लामिक शरिया कानून से निकली व्याख्या है, जिस पर अब भी सरकार बहस के लिए तैयार नहीं है। जानकारों के मुताबिक ऐसी हत्याओं की जड़ें उस गहरी पितृसत्तात्मक सोच से निकलती हैं, जो महिलाओं को अपने से कमतर और उसके साथ अन्याय को आम मानता है। कई सदियों से ईरानी समाज ऐसी सोच की गिरफ्त में रहा है। आज कुछ लोग उससे निकले हैं, लेकिन समाज पर रूढ़िवादी सोच की पकड़ बरकरार है।

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