फिर चुनाव हों ही क्यों?

जम्मू-कश्मीर में जिला परिषद किस मकसद से कराए जा रहे हैं, ये समझना मुश्किल है। चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने जिस तरह की कार्रवाइयां कश्मीर के राजनीतिक दलों के ऊपर की हैं, उसके बाद इन चुनावों का औचित्य संदिग्ध हो गया है। अगर चुनाव जम्मू-कश्मीर के लोगों को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने के लिए कराया जा रहा है, तो यह तय है कि अब ये मकसद हासिल होना कठिन है। अगर कश्मीर के राजनीतिक दल ‘गुपकार गैंग’ हैं, तो फिर तो उन्हें चुनाव में हिस्सा ही क्यों लेने दिया जा रहा है? कश्मीर के प्रमुख नेताओं में एक महबूबा मुफ्ती ने पिछले दिनों दावा किया कि उन्हें “फिर से अवैध रूप से नजरबंद” कर दिया गया है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि भाजपा के मंत्रियों और कार्यकर्ताओं को कश्मीर के हर इलाके में घूमने की इजाजत है, लेकिन कश्मीरी नेताओं को प्रशासन सुरक्षा की दलील दे कर कहीं जाने नहीं देता।

गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती की पार्टी पीडीपी के युवा नेता वहीद उर-रहमान के अचानक गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद मुफ्ती उनके परिवार से मिलना चाह रही थीं। लेकिन उनके अनुसार प्रशासन ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी। मुफ्ती ने दावा किया कि उनकी बेटी इल्तिजा को भी नजरबंद कर दिया गया है। मुफ्ती का दावा पूरी तरह सच है या नहीं, बाहरी किसी व्यक्ति के लिए इसे जानना मुश्किल है। लेकिन कश्मीर में जो माहौल है, उसके बीच ऐसी खबर एक दिन के लिए भी आई या फैली, तो उससे पहले से ही पाताल में पहुंचा, जन विश्वास में और छेद हो जाती है। पिछले साल जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत महबूबा मुफ्ती को नजरबंद किया गया था। उनके अलावा नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और श्रीनगर से लोकसभा सांसद फारूक अब्दुल्ला, उनके बेटे उमर अब्दुल्ला समेत वादी के कई अन्य कई नेताओं को भी नजरबंद कर दिया गया था। पिछले कुछ महीनों में सभी बड़े नेताओं को एक एक करके रिहा किया गया। हाल ही में छह पार्टियों ने मिलकर “गुपकार गठबंधन” नाम का गठबंधन बनाया। ये वो बिंदु था, जहां से कश्मीर में फिर से राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत हो सकती। जम्मू-कश्मीर में स्थानीय जिला विकास परिषद के (डीडीसी) पदाधिकारियों के हो रहा चुनाव इसका बढ़िया मौका बन सकता था। लेकिन अब यह हाथ से निकलता नजर आ रहा है।

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