लेबनान पर फिर फोकस

पिछले हफ्ते बेरूत में हुए धमाके ने एक बार फिर इस देश की बदहाली की तरफ दुनिया का ध्यान खींचा है। उस विस्फोट का कारण तो तुरंत पता नहीं चला, लेकिन उसमें डेढ़ सौ से ज्यादा लोग मारे गए। पांच हजार से ज्यादा लोग घायल हुए। इससे ये बात चर्चा में आई कि लेबनान इस समय ऐसा संकट झेल रहा है, जैसा उसने पिछले कई दशकों में नहीं देखा। आर्थिक संकट, सामाजिक असंतोष, कोरोना महामारी और राजधानी बेरूत के विस्फोटों से थरथराने की घटना से इस मध्य पूर्वी देश की परेशानियां और गहरा गई हैं। 1975 से 1990 तक लेबनान गृहयुद्ध की चपेट में रहा। इसके बाद भी दो दशक से लंबे समय तक सीरिया की सेनाएं देश में रहीं। 2005 में लेबनान के तत्कालीन प्रधानमंत्री रफीक हरीरी की हत्या से उपजी स्थिति देश के राजनैतिक और आर्थिक इतिहास में एक बड़ा मोड़ लेकर आई। रफीक हरीरी के दस्ते पर एक बड़ा आत्मघाती बम हमला हुआ था, जिसमें हरीरी के अलावा 21 और लोग भी मारे गए थे। विपक्ष ने इसके पीछे सीरिया का हाथ बताया था। खुद लेबनान के शक्तिशाली शिया गुट हिजबुल्लाह पर भी इसका संदेह रहा है। इसके बाद देश में बहुत बड़े स्तर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के चलते सीरियाई सेना को लेबनान छोड़ना पड़ा।

सीरिया की सेना 29 साल से लेबनान में रही। जुलाई 2006 में हिजबुल्लाह ने दो इजराइली सैनिकों को कब्जे में ले लिया, जिसके कारण इजराइल के साथ जंग छिड़ गई। 34-दिन चली इस जंग में 1,200 लेबनानी मारे गए। मई 2008 में एक बार फिर एक हफ्ते तक हिंसक झड़पें चलीं। इसमें करीब 100 लोगों की जान चली गई थी। जुलाई 2008 में जाकर लेबनान में एक 30-सदस्यों वाली राष्ट्रीय एकता सरकार के गठन पर सहमति बनी, जिसमें हिजबुल्लाह और उसके सहयोगियों को वीटो करने की शक्ति दी गई। उसके बाद हालत कमोबेश स्थिर रही है। लेकिन देश की बिगड़ती आर्थिक हालत और गिरती मुद्रा के कारण आमजन को हो रही परेशानियों के चलते सितंबर 2019 में सैकड़ों लोग राजधानी बेरूत की सड़कों पर उतरे। करीब डेढ़ महीने तक वहां ऐसे हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए, जिनके बाद प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार समेत इस्तीफा दे दिया। मगर उससे आर्थिक संकट का हल नहीं निकला है। लेबनान पर 92 अरब डॉलर का कर्ज है। देश की आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। इन्हीं हालात में हुए धमाके ने देश को गहरे मुसीबत में डाल दिया है। आशंका यह है कि कहीं फिर यह देश अस्थिरता के दौर में ना फंस जाए।

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