जब हो ऐसी अमानवीयता!

चार दशक पहले बिहार के भागलपुर में कुछ कथित अपराधियों की आंख फोड़ देने की घटना हुई थी। तब समाज में इतनी संवेदना थी कि उसको लेकर कई दिनों तक व्यग्रता जाहिर की जाती रही। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संसद में कहा था कि देश किधर जा रहा है, वो नहीं समझ पा रही हैं। हालांकि तब इस पर कटाक्ष किए गए थे कि अगर ड्राइवर को यह नहीं मालूम की गाड़ी किधर जा रही है, तो उसमें बैठे यात्रियों का क्या हाल होगा! बहरहाल, तब से आज तक हालत बहुत बदल चुकी है। अब ना समाज में वैसी संवेदना है, और राजनेताओं में। इसलिए वैसी ही अमानवीय घटनाएं होती चली जाती हैं और उस पर कुछ रस्मी प्रतिक्रियाओं के अलावा कुछ नहीं होता। अब एक ऐसी ही घटना उत्तर प्रदेश के बरेली में हुई है।

कोरोना वायरस को फैसले से रोकने के लिए लागू किए गए लॉकडाउन के कारण देश के अलग-अलग हिस्सों से उत्तर प्रदेश के बरेली पहुंचे मजदूरों को जिले में प्रवेश करने से पहले एक साथ बिठाकर सैनिटाइजर से नहलाया गया। इन लोगों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। लाजिमी है कि इसके बाद बहुत सारे बच्चों ने अपनी आंखों में जलन की शिकायत की। लेकिन ऐसी शिकायत के बावजूद किसी को अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया। इस घटना का एक वीडियो सामने आया, जिसमें सभी को जमीन पर बैठाकर उनको डिसइंफेक्ट किया जा रहा है। बरेली में कोविड-19 के नोडल अधिकारी अशोक गौतम ने पुष्टि की कि प्रशासन ने प्रवासियों को क्लोरीन और पानी से बने सैनिटाइज़र से नहलाया। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने सरकार द्वारा चलाई गई विशेष बसों में आने वाले प्रवासियों की भारी भीड़ के बाद सैनिटाइटरों से प्रवासियों पर छिड़काव करने का सहारा लिया है। यानी ये काम सीधे प्रशासन ने किया। उचित सवाल उठा है कि क्या ऐसा दृश्य किसी हवाई अड्डे पर देखने को मिल सकता था? क्या प्रशासन गरीबों को इनसान नहीं समझता? हालांकि घटना का वीडियो वायरल होने के बाद मामले पर संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी नीतीश कुमार ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस वीडियो की पड़ताल की गई और प्रभावित लोगों का मुख्य चिकित्सा अधिकारी के निर्देशन में उपचार किया जा रहा है। मगर ये सवाल मौजूं हैं कि क्या इसके लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देश हैं? केमिकल से हो रही जलन का क्या इलाज है? भीगे लोगों के कपड़े बदलने की क्या व्यवस्था है?

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