बीमार होते बच्चे

मोबाइल फोन, कंप्यूटर जैसी तकनीकी डिवाइसें यों तो जीवन को बदलने वाली साबित हुई हैं, लेकिन इनका बेतरतीब इस्तेमाल कहीं ज्यादा घातक साबित हो रहा है। इसे लेकर समय-समय पर चौंकाने वाली बातें और चेतावनियां सामने आती रही हैं। खासतौर से कम उम्र के बच्चे और नौजवान गैजेटों की लत के ज्यादा शिकार हो रहे हैं। यह चिंताजनक बात इसलिए है कि कम उम्र में बच्चे गंभीर शारीरिक और मानसिक रोगों के शिकार होते जा रहे हैं। हाल में ऐसे ही एक शोध अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है कि जो बच्चे रोजाना दो घंटे टीवी देखने, कंप्यूटर के सामने बैठने या स्मार्टफोन जैसी डिवाइसों के साथ बिताते हैं उनमें पीठ संबंधी गंभीर बीमारी तेजी से हो रही हैं। दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में दस से उन्नीस साल के सौलह सौ बच्चों पर किए गए अध्ययन में पता चला है कि तिरसठ फीसद बच्चे पीठ की मांसपेशियों, रीढ़ की हड्डी में दर्द जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। लड़कों के मुकाबले लड़कियां इस तरह की बीमारियों से ज्यादा ग्रस्त हैं।

ऐसे शोध पहले भी होते रहे हैं। स्कूली बच्चों पर बस्ते का बोझ भी बच्चों में पीठ दर्द का बड़ा कारण निकला है। लेकिन सवाल यह है कि हम कैसे इस तरह की समस्याओं से निजात पा सकते हैं। तकनीक का इस्तेमाल करना छोड़ पाना संभव नहीं है। बिना कंप्यूटर या स्मार्टफोन के आज जीवन की कल्पना संभव नहीं लगती। ऐसे में क्या हो? दरअसल, तकनीक और जीवन में जिस संतुलन की जरूरत होती है, उसका साफ तौर पर हमारे जीवन में अभाव है। आधुनिक जीवनशैली ने लोगों को तकनीक पर निर्भरता ज्यादा बढ़ा दी है। रहन-सहन, खान-पान विकृत रूप धारण कर चुका है। एकल परिवारों ने भी बच्चों के साथ बड़ा ज्दती की है। बच्चों का मनोरंजन खेल के मैदान या पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति से अलग सिर्फ गैजेटों में सिमट कर रह गया है। एम्स में हुए इस शोध में इस बात पर जोर दिया गया है कि बच्चों को ऐसी समस्याओं से बचाने के लिए परिवारों को ही आगे होगा, ताकि उन्हें तकनीक के बेजा इस्तेमाल से बचाया जा सके। जहां तक भारी बस्तों के बोझ का सवाल है, केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय पहले ही कई निर्देश जारी कर चुका है। लेकिन स्कूलों में ऐसे नियमों अनदेखी करते हुए बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्त करने की कोई कवायद होती नहीं दिखी। अग कम उम्र में ही बच्चे खराब जीवनशैली की वजह से गंभीर बीमारियों का शिकार होने लगेंगे तो कैसे भारत स्वस्थ नौजवान पीढ़ी तैयार कर पाएगा, इस बारे में मंथन होना चाहिए।

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