तनाव में क्यों जवान?

मंगलवार को सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे ने जवानों में तनाव के मुद्दे पर भी प्रतिक्रिया दी। कहा कि पिछला साल चुनौतियों से भरा था। कोरोना महामारी की चुनौती थी, तो दूसरी तरफ देश के उत्तरी सीमाओं पर प्रतिकूल स्थिति पैदा हुई। तो साफ है कि उन्होंने भी यह माना कि जवानों में तनाव है। इस खबर से देश की नींद उड़ जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। शायद इसलिए आज के नियंत्रित नैरटिव के दौर में बहुत से लोगों को इस बारे में जानकारी ही नहीं मिली होगी। या जानकारी मिली होगी, तो उसकी प्रस्तुति इतने मद्धम रूप में सामने आई होगी कि यह उन्हें ज्यादा अहम नहीं लगा होगा। बहरहाल, खबर यह है कि एक थिंक टैंक ने शोध के मुताबिक भारतीय फौज में आधे से ज्यादा जवान तनाव की चपेट में हैं।

भारतीय सेना ने इस रिपोर्ट को सीधे तौर पर खरिज नहीं किया। सिर्फ यह कहा कि शोध के लिए लिए गए सैंपल का साइज बहुत छोटा है। इसलिए यह असली तस्वीर नहीं है। उसके लिए सैंपल साइज को बढ़ाने की जरूरत है। मगर ये बात गौरतलब है कि ये रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय के थिंक टैंक द यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (यूएसआई) की है। उसके शोध में दावा किया गया है कि 13 लाख जवानों वाली भारतीय फौज में आधे से अधिक गंभीर तनाव के शिकार हैं। कहा गया कि भारतीय सेना हर साल दुश्मन या आतंकवादी हमलों की तुलना में आत्महत्या, भयावह घटनाओं और अप्रिय घटनाओं के कारण अधिक जवानों को खो रही है। शोध में दावा किया गया था कि दो दशक में भारतीय सेना में तनाव का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक साल 2010 से अब तक सेना के अलग-अलग पदों पर तैनात 1100 कर्मियों ने खुदकुशी की है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ये अध्ययन एक सेवारत कर्नल ने किया। पिछले महीने यूएसआई की वेबसाइट पर इसे प्रकाशित किया गया। मगर बाद में उसे वेबसाइट से हटा दिया गया था। जबकि पहले कहा गया था कि यूएसआई ने एक साल के शोध के बाद यह रिपोर्ट जारी की है। इस मंगलवार को सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे ने अपनी वार्षिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जवानों में तनाव के मुद्दे पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि पिछला साल चुनौतियों से भरा था। एक तरफ कोरोना महामारी से निपटना बड़ी चुनौती था, तो दूसरी तरफ देश के उत्तरी सीमाओं पर प्रतिकूल स्थिति पैदा हुई। तो साफ है कि उन्होंने भी यह माना कि जवानों में तनाव है। तो सवाल है कि इसका समाधन क्या है? क्या इसके लिए सरकार ने कोई विशेष पहल की है? इन सबसे भी बड़ा सवाल है कि आज के दौर में ये सवाल कौन पूछेगा?

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