ये प्रश्न अनुत्तरित है

बहुचर्चित निर्भया कांड के मुजरिमों को आखिरकार बीते शुक्रवार को फांसी हो गई। दिसंबर 2012 में हुए निर्भया सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले के चारों दोषियों को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई। इस पर मीडिया से लेकर सियासी हलकों और आम चर्चाओं में खुशी जताई गई। आम भाव यह था कि उस जघन्य अपराध का बदला ले लिया गया। आज देश का माहौल ऐसा है कि इसमें मीडिया से बनाए गए माहौल में असहमति या अलग राय की जगह खत्म-सी हो गई है। इसलिए इस मौके पर फांसी की सजा की उपयोगिता पर उठाए गए सवाल कहीं दब कर रह गए। लेकिन ये सवाल अप्रसांगिक नहीं हैं। असल मुद्दा यह है कि क्या अब देश में बलात्कार नहीं होंगे? या ऐसी घटनाओं में कमी आएगी? अगर ऐसा नहीं होता है तो सवाल उठेगा कि फिर फांसी पर इस सार्वजनिक जश्न से क्या हासिल होगा? ये सवाल भी उठेगा कि न्यायिक प्रक्रिया के कारण फांसी में हुई देर पर बेचैनी क्यों थी?

गौरतलब है कि फांसी से कुछ ही घंटों पहले गुरुवार देर रात निर्भया सामूहिक मामले के दोषियों ने फांसी पर रोक लगाने के लिए पहले दिल्ली हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने ही फांसी पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और दोषियों की याचिका को खारिज कर दिया। मामले की आधी रात को हुई सुनवाई में दिल्ली हाई कोर्ट ने दोषियों के वकील की फांसी पर रोक लगाने की याचिका को इस आधार को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि दोषियों में से एक अपराध के साथ नाबालिग था। हाई कोर्ट से निराशा हाथ लगने के बाद दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। शुक्रवार तड़के लगभग 4:30 बजे सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने दोषियों में से एक पवन गुप्ता की राष्ट्रपति द्वारा दूसरी दया याचिका खारिज करने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। इससे पहले निर्भया सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले के चार में से तीन दोषियों ने हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय अदालत  का दरवाजा खटखटाकर अपनी ‘गैर कानूनी फांसी की सजा’ रोकने का अनुरोध किया था। इसमें इन्होंने आरोप लगाया था कि ‘दोषपूर्ण’ जांच के जरिये उन्हें दोषी करार दिया गया। देश की न्याय प्रक्रिया पर ये सवाल उचित नहीं है। मगर सजा का औचित्य प्रश्नों के घेरे में है।

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