जब यूरोप में है ये हाल!

आम तौर पर यूरोप को स्वच्छ और मानव विकास के पैमानों पर बहुत ऊपर माना जाता है। लेकिन हाल में यूरोपियन एनवायरनमेंट एजेंसी (ईईए) की आई एक रिपोर्ट ने हैरान करने वाली जानकारी दी है। इसके अनुसार यूरोपीय संघ में आठ में से एक मौत प्रदूषण के कारण होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना महामारी ने लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया है। इसके बावजूद जो तस्वीर इस रिपोर्ट से सामने आई है, उससे यूरोप में प्रदूषण पर चर्चा तेज हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक यूरोपीय संघ के 27 देशों और ब्रिटेन को मिला कर 2012 के आंकड़े अगर देखे जाएं, तो पता चलता है कि 6,30,000 मौतें किसी ना किसी तरह से पर्यावरण से जुड़ी थी। खास कर बुजुर्गों और बच्चों की सेहत पर प्रदूषण का बड़ा असर देखा गया है। इसे कैंसर तथा हृदय रोगों के लिए जिम्मेदार बताया गया है।

ईईए के मुताबिक इन मौतों का सबसे बड़ा कारण रहा वायु प्रदूषण और दूसरा ध्वनि प्रदूषण। कोपनहेगन स्थित एजेंसी ईईए के अनुसार ईयू में वायु प्रदूषण के कारण सालाना चार लाख लोगों की अकाल मृत्यु हो जाती है। खराब हवा में सांस लेने के कारण लोगों को दमा जैसी बीमारियां हो रही हैं। इसके अलावा डायबिटीज, फेफड़ों के रोग और कैंसर को भी इससे जोड़ कर देखा जा रहा है। इसी तरह ईईए का कहना है कि लंबे समय तक शोर में वक्त गुजारने के कारण ईयू में सालाना 12,000 लोगों की बेवक्त मौत हो रही है। गंभीर बीमारियों के चलते ना केवल लोगों का जीवन छोटा हो रहा है और जीवन की गुणवत्ता पर भी असर पड़ रहा है। साथ ही लोगों के परिवारों और देशों के मेडिकल सिस्टम पर भी तनाव बढ़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन मौतों को रोका जा सकता है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि प्रदूषण के कारण कोरोना संक्रमण के मामले बढे हैं। इसके अनुसार अगर हवा साफ होती तो लोगों की इम्यूनिटी बेहतर होती और वे कोरोना वायरस के कारण अपनी जान ना गंवाते। लॉकडाउन के दौरान पर्यावरण प्रदूषण कुछ वक्त के लिए रुका। इसके बावजूद माना जा रहा है कि आने वाले दशकों में यूरोपीय देश प्रदूषण को कम करने के अपने लक्ष्य पूरे नहीं कर पाएंगे। जाहिर है, यूरोपीय देशों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी है।

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