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जलवायु वार्ताः आशा और निराशा

पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर हुए कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज के सम्मेलन का निराशाजनक अंत हुआ। जलवायु परिवर्तन की समस्या गंभीर होती जा रही है, जबकि ये सम्मेलन महज एक औपचारिक बनकर रह गया। बहरहाल, एक अच्छी खबर यह है कि ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में 2050 तक नेट जीरो एमिशन समझौते पर सहमति बन गई है। पोलैंड फिलहाल इस समझौते से बाहर है। इस समझौते से क्या लाभ होगा। ध्यान रहे कि वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि आने वाले सालों में पृथ्वी का औसत तापमान 1.5 से 2 डिग्री तक बढ़ जाएगा। इसको रोकने के लिए जीवाश्म ईंधनों का उपयोग कम करना ही होगा। यूरोपीय संघ की 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 20 साल में यूरोपीय संघ का कार्बन उत्सर्जन कम तो हुआ है, लेकिन अभी भी विश्व के कार्बन उत्सर्जन का 9.6 प्रतिशत हिस्सा यूरोपीय संघ से निकलता है। नेट जीरो एमिशन का मतलब एक ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार करना है, जिसमें जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल ना के बराबर हो, कार्बन उत्सर्जन करने वाली दूसरी चीजों का इस्तेमाल एक दम कम हो, जिन चीजों से कार्बन उत्सर्जन होता है उसे सामान्य करने के लिए कार्बन सोखने के इंतजाम भी साथ में किए जाएं। नेट जीरो एमिशन का मतलब एक ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसमें कार्बन उत्सर्जन का स्तर लगभग शून्य हो।

विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले सालों में अगर ठोस इंतजाम नहीं किए गए, तो पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ जाएगा। इस बढ़ोत्तरी को दो डिग्री से कम रखने के लिए नेट जीरो एमिशन जैसी व्यवस्था बेहद जरूरी है। यूरोपीय देशों का कहना है कि उनका समझौता 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते के तहत ही है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए यूरोपीय संघ के सदस्य देशों को जीवाश्म ईंधनों की वजह से हो रहे कार्बन ईंधनों का विकल्प तलाशना होगा। ये विकल्प ऐसे होने चाहिए जो प्रदूषण न फैलाएं। पोलैंड ने इस समझौते में शामिल होने से इनकार कर दिया। पोलैंड में 80 प्रतिशत ऊर्जा उत्पादन कोयले की मदद से होता है। पोलैंड ने फिलहाल खुद को इस समझौते से बाहर रखा है। लेकिन दूसरे यूरोपीय नेताओं का कहना है कि यूरोपीय संघ में इस मुद्दे पर कोई मतभेद नहीं है। कोई सदस्य देश इस मुद्दे पर और विचार करना चाहता है। इसमें कोई परेशानी नहीं है। ये खबर आस जगाने वाली है। लेकिन कुल तस्वीर निराशाजनक बनी हुई है।

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