किसानों की अब फिक्र नहीं?

किसानों के लिए बीमा योजनाओं में केंद्र सरकार ने हाल में एक बड़ा बदलाव किया। अपेक्षा के अनुरूप ही उस पर विवाद खड़ा हो गया है। कहा जा रहा है कि सरकार ने किसानों का साथ छोड़ दिया है। किसान संगठनों ने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की है। बीते हफ्ते प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) और पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना (आरडब्ल्यूबीसीआईएस) में बदलावों की घोषणा की गई। कृषि अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञों ने इन बदलावों पर निराशा जाहिर की है। सरकार ने अपनी तरफ से सबसे ज्यादा जोर इस बात पर देना चाहा कि बीमा लेना अब अनिवार्य नहीं होगा। यानी किसानों को अनिवार्य रूप से बीमे के प्रीमियम के भुगतान का बोझ नहीं उठाना पड़ेगा। हालांकि नए नियमों के अनुसार इन योजनाओं के तहत केंद्रीय सब्सिडी की सीमा बिना सिंचाई वाली फसलों के लिए 30 प्रतिशत और सिंचाई वाली फसलों के लिए 25 प्रतिशत पर तय कर दी है। इसका सीधा मतलब है कि बीमा योजना में केंद्र सरकार के सहयोग को बड़े पैमाने पर कम कर दिया गया है। पहले व्यवस्था यह थी कि इन दोनों योजनाओं के तहत किसानों को खरीफ की फसलों के लिए दो प्रतिशत प्रीमियम, रबी की फसलों के लिए डेढ़ प्रतिशत प्रीमियम और बागवानी की फसलों के लिए पांच प्रतिशत प्रीमियम खुद भरना पड़ता था। इसके बाद जो अंतर बचता था, उसका भुगतान राज्य सरकारें और केंद्र सरकार आधा आधा करती थीं।

राज्य सरकारों को छूट थी कि वो चाहें तो अपनी तरफ से अतिरिक्त सब्सिडी भी दे सकती हैं। अभी तक केंद्रीय सब्सिडी की कोई सीमा नहीं थी। लेकिन नए निर्देशों के बाद इसकी सीमा 25 प्रतिशत और 30 प्रतिशत तय कर दी गई है। इस से राज्यों पर सब्सिडी का भार बढ़ जाएगा। किसान संगठनों और कृषि और विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है क्या इस नए निर्णय का मतलब यह है कि केंद्र सरकार बीमा योजना से अपना हाथ खींच रही है? यह तो साफ है कि अगर बीमा कंपनियों ने प्रीमियम रेट केंद्र की सीमा से ऊपर तय कर दी, तो केंद्र सरकार अपना हाथ खींच लेगी। आलोचकों का कहना कि इस से ज्यादा बड़ा किसान-विरोधी कदम कोई नहीं हो सकता। नए नियमों की वजह से फसलों का बीमा कवरेज गिर जाएगा और किसानों के लिए जोखिम बढ़ जाएगा। साफ है कि सरकार को अब किसानों की वैसी फिक्र नहीं है, जैसी पिछले आम चुनाव के पहले उसने दिखाई थी।

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