सुहावने सपनों में कमी नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्म-निर्भर भारत का नया राग छेड़ा है। 20 लाख करोड़ रुपए के घोषित प्रोत्साहन पैकेज (जिसमें नकदी की उपलब्धता और कर्ज की सुविधा बढ़ाने की बातें ही ज्यादा हैं) के जरिए केंद्र सरकार को उम्मीद है कि देसी उत्पादन और उपभोग का ऐसा चक्र चलेगा, जिससे कोविड-19 महामारी के बाद भारत दुनिया के सामने आर्थिक पुनर्निर्माण और विकास की एक अनुकरणीय मिसाल बनकर उभरेगा। इसमें खास उम्मीद सूक्ष्म, लघु और मझौले (एमएसएमई) दर्जे के उद्योगों से जोड़ी गई है। मगर इन उद्योगों की असल हालत क्या है, यह एक ताजा सर्वे से सामने आई है। इसके मुताबिक लॉकडाउन की वजह से एमएसएमई सेक्टर भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कई उद्यमों की हालत ऐसी हो गई कि वे धंधा बंद करने के कगार पर पहुंच गए हैं। ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के सर्वे के मुताबिक 35 फीसदी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम और 37 फीसदी स्व-नियोजित उपक्रमों से जुड़े लोगों ने कहा कि उनके उद्योग की वापसी बहुत मुश्किल है। 32 फीसदी एमएसएमई से जुड़े लोगों ने कहा कि रिकवरी होने में छह महीने का वक्त लगेगा। सर्वे में एमएसएमई, स्व-नियोजित, कॉरपोरेट जगत के सीईओ, कर्मचारियों और विशेषज्ञों से बात की गई। इसमें शामिल सिर्फ 12 फीसदी लोगों ने कहा तीन महीने से भी कम वक्त में उनके उद्योग की स्थिति संभल जाएगी। पिछले हफ्ते जारी जीडीपी के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 11 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है। 2019-20 में जीडीपी वृद्धि की दर गिर कर 4.20 पर आ गई। पिछले दिनों रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कहा था कि देश की विकास दर इस साल नकारात्मक रह सकती है। इस बीच रेटिंग एजेंसी मूडीज इंवेस्टर्स सर्विस ने भारत की सॉवरेन रेटिंग को घटा दिया है।

रेटिंग घटाए जाने का असर भारत में होने वाले निवेश पर पड़ेगा। मूडीज ने रेटिंग को बीएए-2 से घटाकर बीएए-3 कर दिया है। इसके साथ ही रेटिंग एजेंसी ने भारत के परिदृश्य को नकारात्मक बनाए रखा है। मूडीज ने कहा है कि इस वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था में 4 फीसदी की गिरावट आ सकती है। इसके बावजूद मंगलवार सीआईआई के सालाना कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत का जिक्र किया। कहा कि देश अब कोरोना लॉकडाउन को पीछे छोड़ चुका है। देश में ऐसे उत्पाद बनाए जाने चाहिए जो ‘मेड इन इंडिया’ हों लेकिन ‘मेड फॉर वर्ल्ड हों’। ऐसे सपने सुहावने होते हैं। मगर मूल प्रश्न है कि क्या ये यथार्थ पर टिके हैं?

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