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दंगों पर राजनीति

दिल्ली दंगों के मुद्दे पर सोमवार को संसद के दोनों सदनों में जिस तरह की हालत देखने को मिली, वह दुख और शर्म की बात है। अगर दंगे जैसे संवेदनशील मसले पर किसी सार्थक चर्चा या संवाद के बजाय जनप्रतिनिधि धक्का-मुक्की, मारपीट जैसे अशोभनीय कृत्य करने लगें, तो यह जाहिर होता है कि उनके मुद्दे दंगा नहीं है, बल्कि इसकी आड़ में पक्ष-विपक्ष की क्षुद्र राजनीति है। दिल्ली दंगों के लिए सरकार को दोषी ठहराते हुए कांग्रेस की अगुआई में विपक्षी दलों ने सरकार को घेरा और इस मुद्दे पर गृहमंत्री अमित शाह का इस्तीफा मांगा। यह होना भी चाहिए और एक जिम्मेदार विपक्ष का यह फर्ज भी बनता है कि वह सरकार पर दबाव बनाते हुए दंगे की जांच करवाए और सच्चाई को सामने लाए। लेकिन बजाय इसके लोकसभा में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जिस तरह की तू-तू-मैं-मैं और भाजपा तथा कांग्रेस सदस्यों के बीच धक्का-मुक्की देखने को मिली, उससे दंगे का मुद्दा पीछे छूट गया। भाजपा सांसद जसकौर मीणा कांग्रेस की राम्या हरिदास को धक्का दे दिया। विपक्षी सदस्य हाथों में पोस्टर लिए अध्यक्ष के आसन के पास पहुंचे तो भाजपा की महिला सांसदों ने रास्ता रोक दिया और यह सारा नजारा धक्का-मुक्की में ऐसे तब्दील होता चला गया जैसे सड़कों-गलियों में आमतौर पर देखने को मिल जाता है।

एक गंभीर मसले पर सांसदों के इस तरह के आचरण से सदन की मर्यादा तार-तार हुई है, यह जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों को समझना चाहिए। हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब इस तरह के हालात सदन में देखने को मिल रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ समय में प्रधानमंत्री सहित कई बड़े नेता सदन के भीतर कामकाज, सांसदों की सदन में गैरहाजिरी और सदन में उनके आचरण को लेकर जिस तरह की चिंता जताते रहे हैं, उसे देखते हुए सोमवार की घटना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लगता है दंगों के बाद पक्ष और विपक्ष ने पहले ही यह तय कर लिया था कि क्या करना है और कैसे निपटना है। दिल्ली के दंगों में पैंतालीस से ज्यादा लोगों की मौत ने न केवल देश भर को हिला दिया है, बल्कि विदेशों में भी भारत की छवि बिगड़ी है। दंगों के बाद अफवाहों के दौर से लोग और सहम गए हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों को आपसी खींचतान के बजाय सबसे पहले इस पर विचार करना चाहिए था कि दंगाग्रस्त इलाकों में हालात जल्द से जल्द कैसे सामान्य हों, कैसे लोगों में खौफ कम हो और व्यवस्था के प्रति भरोसा पैदा हो, बच्चे बिना तनाव के परीक्षा दे सकें, लोग फिर से कामधंधे शुरू कर सकें। पर यह सब कहीं नहीं हो रहा। बजाय इसके सत्तापक्ष चौरासी के दंगों का हवाला देकर मुद्दे को हल्का बना रहा है।

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