कुछ वाजिब सवाल उठे हैं

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन जिस जल्दबाजी से लगाया गया,

उससे कई सवाल उठे हैं। खासकर राज्यपाल की भूमिका सवालों के घेरे में है।

जब एनसीपी को रात साढ़े आठ बजे तक का समय दिया गया था,

तो दिन में तीन बजे राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करने का क्या तर्क था?

फिर ये प्रश्न भी है कि क्या केंद्र ने प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा के मद्देनजर

आनन-फानन दिन में ही ये फैसला लिया?

गौरतलब है कि 24 अक्तूबर को आए विधान सभा चुना नतीजों में किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला था।

लेकिन भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना के गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ था।

भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें मिली थीं। शिव सेना नंबर दो पर थी।

चूंकि दोनों पार्टियां पहले से गठबंधन में थीं, उम्मीद थी कि दोनों साथ मिलकर सरकार बना लेंगी।

पर शिव सेना ने 50:50 फार्मूला के तहत सरकार चलाने की मांग कर के सबको चौंका दिया।

इसका मतलब था कि भाजपा और शिव सेना ढाई-ढाई साल के लिए सरकार का नेतृत्व करते।

इसके बाद दोनों पार्टियों में खींच-तान शुरू हो गई।

फिर भी उम्मीद थी कि कुछ न कुछ समझौता हो जाएगा,

क्योंकि दोनों पार्टियां लगभग पिछले 30 सालों से गठबंधन में थीं।

लेकिन अनपेक्षित रूप से दोनों पार्टियों के बीच कोई समझौता नहीं हो पाया

और भाजपा सरकार बनाने की कोशिशों से पीछे हट गई।

शिव सेना ने दावा किया कि वो कुछ और पार्टियों और विधायकों की मदद से सरकार बना लेगी

और राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी ने उसे न्योता भी दिया।

पर वह राज्यपाल की तरफ से दी गई 24 घंटे की अवधि में आवश्यक संख्या में

विधायकों के समर्थन पत्र नहीं दिखा पाई और उन्हें जुटाने के लिए तीन दिन का समय मांगा।

राज्यपाल ने अतिरिक्त समय देने से इंकार कर दिया और

विधायकों की संख्या की दृष्टि से तीसरे नंबर की पार्टी एनसीपी को सरकार बनाने का न्योता दिया। शिव सेना और एनसीपी नेता शरद पवार की एनसीपी ने मिलकर सरकार बनाने की बात की, लेकिन पर्याप्त सीटें न होने की वजह से कांग्रेस से भी समर्थन की गुजारिश की। कांग्रेस इसके लिए तैयार हो गई। मगर इस बीच ही राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी, जिसे केंद्र सरकार ने तुरंत स्वीकार कर लिया। मुद्दा यह है कि क्या राज्यपाल और केंद्र को अभी और इंतजार नहीं करना चाहिए था? मकसद सरकार बनवाना था, या विपक्ष को इसके अवसर से वंचित करना?

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