priyanka kisan nyay rally बनारस रैली के बाद
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बनारस रैली के बाद

जो स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया देखने को मिली, उसे भाजपा विरोधियों ने इसका संकेत समझा है कि जनता में मौजूदा सरकार के प्रति नाराजगी है। लेकिन असमंजस का कारण यह है कि अगर सचमुच उत्तर प्रदेश में कांग्रेस फिर से खड़ी हुई, तो उससे विपक्षी वोटों का और ज्यादा बिखराव हो जाएगा।

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी की बनारस में अप्रत्याशित रूप से सफल रैली के बाद उन लोगों में एक साथ उत्साह और असमंजस पैदा हुआ है, जो उत्तर प्रदेश में ‘योगी राज’ की समाप्ति चाहते हैँ। रैली में जैसी भीड़ उमड़ी और उसमें जो स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया देखने को मिली, उसे भाजपा विरोधियों ने इस बात का संकेत समझा है कि जनता के एक बड़े हिस्से में मौजूदा सरकार के प्रति नाराजगी है। कोरोना महामरी के खराब प्रबंधन, बिगड़ती आर्थिक स्थिति, महंगाई, और कानून-व्यवस्था की खराब समस्याओं की वजह से लोग विकल्प की तलाश में हैं। इससे भाजपा विरोधी खेमे में उम्मीद जगी है। लेकिन असमंजस का कारण यह है कि अगर सचमुच उत्तर प्रदेश में कांग्रेस फिर से खड़ी हुई, तो उससे भाजपा विरोधी वोटों का और ज्यादा बिखराव हो जाएगा। इसका लाभ भाजपा को मिलेगा। कहा जा सकता है कि ये आशंका गलत नहीं है।

इसके बावजूद यह इस बात का तर्क नहीं हो सकता कि इस डर से कांग्रेस या कोई पार्टी उत्तर प्रदेश या किसी राज्य में खुद को सक्रिय ना करे। प्रियंका गांधी की रैली को समर्थन मिला, तो उसकी बड़ी वजह यह है कि हाल के समय में वे सक्रिय रही हैं। जहां भी कोई बड़ी घटना हुई, वे संघर्ष करती दिखीं। जबकि अखिलेश यादव के बारे में ये आम शिकायत है कि वे आरामतलबी से ट्विटर के जरिए राजनीति करते हैँ। मायावती को तो खैर, अब कोई विपक्ष का हिस्सा नहीं मानता। बहरहाल, अगर सामाजिक समीकरणों के हिसाब से देखें, सिर्फ एक मतदाता वर्ग है, जहां कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का समर्थन आधार टकराता है। वह वर्ग अल्पसंख्यक वोटों का है। बाकी वोटरों में अगर कांग्रेस के लिए समर्थन बढ़ा, तो उसका नुकसान भाजपा को और एक हद तक बहुजन समाज पार्टी को हो सकता है। वैसे जमीनी स्तर पर क्या भावना है, इसका अंदाजा अभी भी बहुत साफ नहीं है। ऐसे में विपक्ष की उम्मीदें बहुत चमकती हुई नहीं हैँ। भाजपा के लिए देश के उसके तमाम आधार राज्यों में लगभग 35 फीसदी वोटरों की गोलबंदी अब तक कायम दिखती है। अगर यह उप्र में भी है, तो भाजपा के हारने की सूरत नहीं है। इसलिए उसके बीच रास्ता संघर्ष की राजनीति ही है। वह प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस करती दिख रही है। इसलिए उसे समर्थन भी मिलने के संकेत हैँ।

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