पाकिस्तान में प्रगति

पाकिस्तान से इन दिनों सुखद आश्चर्य वाली खबरें आ रही हैं। एक हिंदू मंदिर तोड़ने की घटना के बाद जिस तरह पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर पुनर्निर्माण कराने का आदेश दिया और उसे वहां की सरकार ने स्वीकार किया, वह हैरतअंगेज ही है। कट्टरपंथ से ग्रस्त इस इस्लामी देश में अल्पसंख्यकों के प्रति ऐसी भावना असाधारण मानी जाएगी। इसके बाद ये खबर आई कि पाकिस्तान के एक हाई कोर्ट ने बलात्कार के मामलों में टू फिंगर टेस्ट को असंवैधानिक ठहरा दिया है। महिला अधिकारों के नजरिए से यह एक बड़ी प्रगति है। भारत में भी ये टेस्ट निर्भया कांड के बाद ही जाकर बंद किया गया था। बलात्कार पीड़ितों के कौमार्य परीक्षण के के लिए ये टेस्ट लंबे समय से होता रहा है। इस परीक्षण के आलोचकों ने परीक्षण को रुकवाने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दी थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन कह चुका है कि इस तरह के परीक्षण की कोई वैज्ञानिक उपयोगिता नहीं होती।

उलटे इससे बलात्कार पीड़ितों के मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। कौमार्य परीक्षण को अवैध बताते हुए लाहौर हाई कोर्ट ने कहा कि यह पीड़िता की व्यक्तिगत मर्यादा को चोट पहुंचाता है। इस वजह से यह जीने के अधिकार और मर्यादा के अधिकार के खिलाफ है। इस तरह के परीक्षण के पैरोकार दावा करते हैं कि इससे महिला की यौन गतिविधियों के इतिहास का पता लगाया जा सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि इस तरह के नतीजों का इस्तेमाल अक्सर बलात्कार पीड़ितों को बदनाम करने के लिए किया जाता है। गौरतलब है कि पाकिस्तानी समाज में बलात्कार पीड़ितों को सामाजिक लांछनों का सामना करना पड़ता है। वहां ये शिकायत रही है कि बड़ी संख्या में महिलाओं पर हिंसा के मामले पुलिस तक पहुंच भी नहीं पाते। जिस याचिका पर अदालत ने यह फैसला दिया उसे दायर करने वाले वकीलों ने एक बयान में कहा कि यह फैसला तहकीकात संबंधी प्रक्रियाओं को सुधारने और उन्हें बलात्कार के पीड़ितों के प्रति न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में एक अति-आवश्यक कदम है। इससे पहले पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने दिसंबर में टू फिंगर टेस्ट पर प्रतिबंध लगा दिया था। यह कदम एक नए बलात्कार विरोधी कानून के तहत उठाया गया था। महिला कार्यकर्ताओं को उचित ही यह उम्मीद है कि लाहौर हाई कोर्ट का फैसला देशव्यापी प्रतिबंध के लिए मिसाल बनेगा।

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