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बंगाल में आंदोलन का राज़

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर असम के बाद हिंसक प्रदर्शनों का दूसरा  काम पश्चिम बंगाल बना है। वहां अनेक स्टेशनों पर तोड़-फोड़ और आगजनी हुई है। लंबी दूरी की तमाम कई ट्रेनें रद्द वहां रद्द करनी पड़ी। बहरहाल, असम और बंगाल में उस कानून के विरोध में एक मूलभूत अंतर है। असम में जहां आंदोलन की कमान छात्रों के हाथों में है, मगर बंगाल में अल्पसंख्यक समुदाय आंदोलनरत है। राज्यपाल और मुख्यमंत्री की अपील और चेतावनियों के बावजूद हिंसा जारी है। दूसरी तरफ इस मुद्दे पर सियासत भी गरमाने चुकी है। राज्य में तृणमूल कांग्रेस की रैलियों और भाजपा की जवाबी रैलियों का भी दौर शुरू हो गया है। भाजपा ने हिंसा को लिए ममता बनर्जी को जिम्मेदार ठहराते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन की चेतावनी दी है। दूसरी ओर ममता ने भाजपा पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है। राज्य के हिंसाग्रस्त छह जिलों में इंटरनेट पर सामयिक तौर पर पाबंदी लगा दी गई है। इसी कारण जानकारों की राय है कि असम और बंगाल में इस कानून के विरोध की वजहें भिन्न हैं। पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यकों की बढ़ती आबादी एक गंभीर समस्या है। आने वाले दिनों में कई चुनाव होने हैं। ऐसे में सत्ता के तमाम दावेदार हिंसा की इस आग में सियासत की रोटियां सेंक रहे हो सकते हैं। पश्चिम बंगाल के खास कर बांग्लादेश से लगे सीमावर्ती इलाकों में इस मुद्दे पर बवाल शुरू हुआ। उधर कुछ अल्पसंख्यक संगठनों ने कोलकाता में नागरिकता कानून के विरोध में एक रैली निकाली। उसके बाद राज्य विभिन्न हिस्सों से सड़कों पर अवरोधक खड़े करने और ट्रेनों की आवाजाही रोकने की खबरें आने लगीं। आगे चलकर इस विरोध ने बेहद उग्र रूप ले लिया। प्रदर्शनकारियों ने कुछ पांच ट्रेनों में भी आग लगा दी। उन स्टेशनों पर तैनात कर्मचारियों ने वहां से भाग कर अपनी जान बचाई। राज्य में कई जगह रेलवे स्टेशनों और पटरियों पर आग लगा दी गई। बड़े पैमाने पर होने वाले इन विरोध प्रदर्शनों से सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया। तृणणूल कांग्रेस ने भी लोगों से हिंसा में शामिल नहीं होने की अपील की है। इस उपद्रव से आम लोगों को परेशानी हो रही है। तृणमूल कांग्रेस ने इस पर जोर दिया है कि यह हिंदू बनाम मुस्लिम की लड़ाई नहीं है। बल्कि दोनों समुदायों को एनआरसी और नागरिकता कानून का मिल कर मुकाबला करना चाहिए।

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