punjab assembly election 2022 पंजाब का जोड़-घटाव
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पंजाब का जोड़-घटाव

punjab assembly election 2022

दलित बहुसंख्या वाले पंजाब के खेतिहर मजदूर संगठनों को कांग्रेस के इस दांव ने ज्यादा आकर्षित नहीं किया है। उन खेतिहर मजदूर संगठनों ने दो टूक कहा है कि मुख्यमंत्री दलित हो या जाट- उससे फर्क नहीं पड़ता। असल सवाल है कि क्या चन्नी के शासनकाल में नीति बदलेगी? punjab assembly election 2022

पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने का कांग्रेस का दांव कितना चलेगा, यह तो छह महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों से ही जाहिर होगा। लेकिन फिलहाल लगता है कि ये गोटी एक हद तक सही पड़ी है। इसका प्रमाण बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी की प्रतिक्रियाएं हैं, जो दलित मुख्यमंत्री का, भले ही अगर-मगर के साथ, लेकिन स्वागत करने को मजबूर हुईं। कहा जा सकता है कि जिन पार्टियों की सारी गणना जातीय प्रतिनिधित्व पर केंद्रित है, उनके पास ऐसे मौकों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने के अलावा कोई चारा भी नहीं होता। लेकिन जिन खेतिहर मजदूर संगठनों को चुनाव नहीं लड़ना है और इसलिए जो सीधे जातीय समीकरण पर निर्भर नहीं हैं, उन्हें कांग्रेस के इस दांव ने ज्यादा आकर्षित नहीं किया है।

Punjab CM CharanjitSingh Channi

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गौरतलब है कि खेतिहर मजदूरों में बहुसंख्या दलित जातियों की ही है। देश के दूसरे हिस्सों के साथ पंजाब में इस समय जो किसान आंदोलन चल रहा है, उसकी एक खूबी खेतिहर मजदूरों को अपने साथ जोड़ने की रही है। इस क्रम में किसान और मजदूर दोनों संगठनों में अपेक्षाकृत बेहतर राजनीतिक चेतना आई है। उन खेतिहर मजदूर संगठनों ने दो टूक कहा है कि मुख्यमंत्री दलित हो या जाट- उससे फर्क नहीं पड़ता। असल सवाल है कि क्या चन्नी के शासनकाल में नीति बदलेगी? इस प्रतिक्रिया में कांग्रेस और दूसरे दलों के लिए यह साफ संदेश छिपा है कि अब जनता के स्तर पर एक नई चेतना पैदा हो रही है। उसके बीच महज प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व की राजनीति लंबे समय तक कारगर नहीं रहेगी। असल सवाल नीति और कार्यक्रम का है।

पंजाब में हटाए गए मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की खामी यह रही कि उन्होंने नीतिगत के सवाल पर बड़ी गड्डमड्ड-सी स्थिति बना दी थी। आज के दौर में जब किसान आंदोलन का समर्थन या विरोध की एक राजनीतिक विभाजन रेखा बन गया है, तब उसकी खुली आलोचना आत्मघाती ही थी। जाते-जाते नवजोत सिंह सिद्धू के खिलाफ उन्होंने जो ‘पाकिस्तान कार्ड’ खेला, उससे उनके प्रति उन लोगों की भी सहानुभूति जाती रही, जो उन्हें एक सक्षम मुख्यमंत्री समझते थे। ऐसे में नया नेता लाना कांग्रेस की मजबूरी भी थी और जरूरत भी। उसने सामाजिक समीकरण के लिहाज से एक साहसी दांव खेला। मगर नीतिगत सवाल पर स्पष्टता नहीं बनी, तो ये दांव मुमकिन है कि उतना सफल ना हो, जितना आज पार्टी नेतृत्व उम्मीद कर रहा है।

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