इस देश में ये होता है!

बात हैरतअंगेज लगती है, लेकिन अब हमारे सामने यह एक हकीकत के रूप में मौजूद है। बिहार के अररिया जिले में सामूहिक बलात्कार की शिकार युवती को ही जेल भेज दिया गया। उस पर न्यायिक कार्य में बाधा डालने का आरोप लगाया गया। अब एक पीड़िता के प्रति इससे बड़ी असंवेदनशीलता और क्या हो सकती है? देश के जाने- माने वकीलों ने हाई कोर्ट से दखल देने की अपील की तो हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया। उनके पत्र को कोर्ट ने जन हित याचिका में तब्दील कर दिया। फिर ये कोई राहत की बात नहीं हो सकती। किसी बलात्कार पीड़िता को न्याय देने के बजाए उसे ही जेल भेज दिया जाए, तो यह गहरे आत्म-निरीक्षण का समय है कि हमारी न्याय व्यवस्था और हमारी सामूहिक संवेदना कहां पहुंच गई है। अररिया जिले में यह घटना उस समय हुई जब सामूहिक बलात्कार की शिकार 22 वर्षीया युवती धारा 164 का बयान दर्ज कराने आई थी। पीड़िता के साथ जनजागरण शक्ति संगठन की दो सहयोगियों को भी जेल भेजा गया।

सामूहिक बलात्कार की घटना छह जुलाई को हुई थी। पीड़ित युवती ने अगले दिन यानी सात जुलाई को अररिया महिला थाने में एफआइआर दर्ज कराई, जिसमें कहा गया कि एक युवक से उसकी पुरानी जान-पहचान थी। उसने छह जुलाई को बाइक सिखाने के बहाने सुनसान जगह में ले जाकर तीन अन्य दोस्तों के साथ उससे सामूहिक बलात्कार किया। इसके बाद उसे एक नहर के पास अकेला छोड़ दिया गया। एफआइआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इसी मामले में 10 जुलाई को पीड़िता अपना बयान दर्ज कराने आई थी। पटना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और अन्य जजों को 15 जुलाई, 2020 को भेजे गए पत्र में देशभर के 376 अधिवक्ताओं ने कहा कि पीड़ित युवती एवं उसके दो सहयोगियों को उसकी मनोदशा को संवेदनशीलता के साथ देखे बिना अदालत की अवमानना के आरोप में मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक हिरासत में लेने का निर्देश जारी किया गया। तीनों को न्यायिक हिरासत में लेकर वहां से 240 किलोमीटर दूर दलसिंहसराय जेल भेज दिया गया। यह भी उल्लेखनीय है कि न्यायिक कार्रवाई के घंटे भर के अंदर पिता के साथ- साथ पीड़िता का विवरण और पूरा पता भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बता दिया गया। क्या कोई कोर्ट इस तरह कायदों और सामाजिक मर्यादा का हनन करता सकता है?

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