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तो अब सेना में भी?

नौकरियों की भर्ती में घोटाला तो कोई नई बात नई है, लेकिन अगर सेना के बारे में ऐसी खबर आए, तो इसे जरूर चिंताजनक माना जाएगा। अफसोसनाक है कि अब ऐसी ही खबर आई है। और ये आरोप कोई मीडिया रिपोर्ट में या विपक्षी पार्टी की ओर से नहीं लगाया गया है। बल्कि खबर के मुताबिक सीबीआई का दावा है कि उसने भारतीय सेना में एक बड़े भर्ती घोटाले का भंडाफोड़ किया है। एजेंसी ने 23 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जिनमें लेफ्टिनेंट कर्नल रैंक के पांच अधिकारियों समेत सेना के कुल 17 अधिकारी शामिल हैं। उनके अलावा सीबीआई ने अलग-अलग अधिकारियों के छह रिश्तेदारों के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है। सेना ने कहा है कि उसकी अपनी खुफिया एजेंसी पहले ही मामले की जांच कर चुकी है। अब चूंकि इसमें नागरिक भी शामिल पाए गए हैं और तफ्तीश के लिए कई एजेंसियों के बीच समन्वय की जरूरत होगी, इसीलिए जांच को सीबीआई के हवाले कर दिया गया है। यानी आरोप पुख्ता है। अब सवाल है कि जो भी लोग भी इसमें शामिल रहे हों, क्या उसे देशद्रोह नहीं माना जाएगा?

हैरतअंगेज है कि इतना बड़ा मामला सुर्खियों में नहीं है। यह अजीब दौर है, जब राजद्रोह के मामले सरकार के आलोचक 20- 22 साल के युवाओं के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं। जबकि सीबीआई ने सोमवार 15 मार्च को इस जांच के तहत पूरे देश में 30 अलग अलग ठिकानों पर छापे मारे। सीबीआई ने कहा है कि इन छापों में कई कागजात मिले हैं और इनका अध्ययन किया जा रहा है। सीबीआई की एफआईआर ब्रिगेडियर (विजिलेंस) वीके पुरोहित की शिकायत पर आधारित हैं। उन्होंने कहा था कि 28 फरवरी 2021 को उन्हें जानकारी मिली थी कि सेना में भर्ती के लिए अस्थायी रूप से ठुकरा दिए गए उम्मीदवारों को दिल्ली के बेस अस्पताल में मेडिकल परीक्षा में पास कराने के लिए सेना के कई कर्मचारियों ने रिश्वत ली। सैन्य कर्मचारियों पर सेना के सर्विसेज सेलेक्शन बोर्ड (एसएसबी) के कई केंद्रों पर रिश्वत लेने के आरोप लगे हैं। अब खुद कुछ सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों ने कहा है कि सेना में इस तरह के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं, लेकिन इसके बावजूद इस मामले को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि सेना भ्रष्टाचार से परे है। लेकिन अगर सेना भी भ्रष्टाचार से परे नहीं है, तो फिर देश की सुरक्षा का क्या हाल होगा?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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