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Wednesday, May 12, 2021
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इतिहास आ धरता है!

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कहा जाता है कि किसी व्यक्ति या समाज का इतिहास उसका पीछा नहीं छोड़ता। आज आप भले अपने किए के परिणाम से बच जाएं, लेकिन एक दिन इतिहास के नाम के साथ न्याय कर देता है। ऐसा ही अब फ्रांस के मामले में हो रहा है। फ्रांस ने अब 1994 में हुए रवांडा के जनसंहार से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों को सामने लाने का फैसला किया है। इससे उम्मीद है कि इस जनसंहार में फ्रांस की भूमिका दुनिया के सामने आ जाएगी। गौरतलब है कि इस जनसंहार में करीब आठ लाख लोगों को मारा गया था। 27 साल पहले अप्रैल महीने में रुवांडा का जनसंहार शुरू हुआ था। इस दौरान बड़ी संख्या में औरतों का बलात्कार हुआ। उस कारण पैदा हुए बच्चे आज भी उस पीड़ा और पहचान के संकट से जूझ रहे हैं। साथ ही उस घटना का साया आज भी फ्रांस और अफ्रीकी देश के रिश्तों पर है। अब देखना है कि सच सामने आने से उससे बाहर निकलने में दोनों पक्षों को कितनी मदद मिलती है।

फ्रेंच इतिहासकारों के एक आयोग ने इस बारे में ऐतिहासिक दस्तावेजों की मदद से एक रिपोर्ट तैयार की है। उसे पिछले महीने राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों को सौंपा गया। इस रिपोर्ट में जनसंहार के लिए फ्रांस की जिम्मेदारी का उल्लेख है। मैक्रों सरकार ने इस घटना से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों को सार्वजनिक करने का भी आदेश दिया है। फ्रांस ने जिन दस्तावेजों को खोलने का आदेश दिया है, वे पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वां मितरां के कार्यकाल के हैं। साथ ही उस वक्त प्रधानमंत्री रहे एदुआर बालादु से संबंधित दस्तावेजों को भी सार्वजनिक किया जाएगा। इन दस्तावेजों में राजनयिक टेलीग्राम और गोपनीय नोट शामिल हैं। इतिहासकारों ने जो रिपोर्ट सौंपी है, उनके स्रोत भी यही दस्तावेज रहे हैं। राष्ट्रपति माक्रों ने कहा है कि वो ऐसी परिस्थितियां बनाना चाहते हैं, जिससे कि रुवांडा में फ्रांस की भूमिका को समझने में मदद मिल सके। 1994 में अप्रैल से जुलाई के बीच इस जनसंहार में मुख्य रूप से तुत्सी अल्पसंख्यक समुदाय के लोग मारे गए थे। ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि मितरां के दौर में यह नरसंहार फ्रांस की नाकामी थी। फ्रांस ने जनसंहार को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए। ऐसा क्यों और किन परिस्थितियों में किया गया, इसके सच से अब परदा उठेगा। दुनिया उस दौर के फ्रांस की भूमिका आखिरकार देख पाएगी।

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