अधर में लटके रोहिंग्या

जब बात जिम्मेदारी की आए, तो महजबी एकता की बात कैसे गायब हो जाती है, इसकी ताजा मिसाल सऊदी अरब है। खुद को इस्लामी दुनिया का नुमाइंदा मानने वाला देश मुसीबत के मारे रोहिंग्या मुसलमानों की जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं है। उसने कहा है कि उसके यहां रहने वाले लगभग 54 हजार रोहिंग्या लोगों को बांग्लादेश वापस ले ले। जबकि एक विदेशी वेबसाइट को दिए एक हालिया इंटरव्यू में बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने कहा कि बांग्लादेश सऊदी अरब में रहने वाले कुछ रोहिंग्या लोगों को कानूनी दस्तावेज मुहैया करा सकता है, ताकि वे वहां वैध ढंग से रह सकें। रोहिंग्या मुसलमानों का संबंध म्यांमार के पश्चिमी प्रांत रखाइन से है। लेकिन म्यांमार उन्हें अपना नागरिक नहीं मानता। अपने साथ भेदभाव और दमन से बचने के लिए बहुत से रोहिंग्या लोगों ने दूसरे देशों में शरण ली है। इनमें सबसे ज्यादा लोग बांग्लादेश में रहते हैं।

लगभग 40 साल पहले सऊदी अरब ने दसियों हजार रोहिंग्या लोगों को अपने यहां आने दिया था। लेकिन अब जाहिर हुआ है कि सऊदी अरब में रहने वालो रोहिंग्या लोगों के पास किसी देश की नागरिकता नहीं है। यहां तक कि शरणार्थियों के जो बच्चे सऊदी अरब में पैदा हुए और अरबी भाषा बोलते हैं, उन्हें भी सऊदी अरब की नागरिकता नहीं दी गई है। गौरतलब है कि बांग्लादेश भी रोहिंग्या लोगों को अपना नागरिक नहीं मानता। मगर अब बांग्लादेश के विदेश मंत्री मोमेन का यह बयान विवादास्पद है कि उनका देश कुछ रोहिंग्या को पासपोर्ट दे सकता है। बांग्लादेश के कुछ विश्लेषकों ने कहा है कि अगर ऐसा हुआ तो तो फिर सऊदी अरब के लिए उन लोगों को बांग्लादेश लौटाना और आसान हो जाएगा। मोमेन का कहना है कि उन्होंने सऊदी अधिकारियों को भरोसा दिलाया है कि बांग्लादेश उन लोगों के पासपोर्ट रिन्यू कर देगा, जो बांग्लादेश से सऊदी अरब गए थे। लेकिन बांग्लादेशी विदेश मंत्री ने कहा कि उनका देश उन शरणार्थियों के बच्चों की कोई जिम्मेदारी नहीं लेगा, जो रोहिंग्या 1970 के दशक से बांग्लादेश में नहीं रह रहे हैं। उनके बच्चों की पैदाइश और परवरिश दूसरे देशों में हुई। जिन 54 लोगों को सऊदी अरब वापस भेजना चाहता है, उनमें से ज्यादातर के पास बांग्लादेश से सऊदी अरब आते हुए बांग्लादेशी पासपोर्ट था या फिर उन्हें सऊदी अरब में मौजूद बांग्लादेशी कंसुलेट से पासपोर्ट मिला था।

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