इंसाफ करें या मध्यस्थता?

क्या सुप्रीम कोर्ट ने अब अपनी भूमिका कोर्ट ऑफ जस्टिस के बजाय मध्यस्थ की बना ली है? ये सवाल तब भी उठा था, जब उसका अयोध्या विवाद पर फैसला आया। अब उसका ऐसा ही रुख जम्मू-कश्मीर से जुड़े मामलों पर देखने को मिल रहा है। ताजा मामला पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की रिहाई के लिए दायर याचिका है। कोर्ट ने बुधवार को केंद्र और जम्मू कश्मीर-प्रशासन को अगले सप्ताह तक यह बताने की हिदायत दी कि क्या पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को रिहा किया जाने वाला है? संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान खत्म कर जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के केंद्र सरकार के पिछले साल पांच अगस्त के फैसले के समय से ही उमर अब्दुल्ला हिरासत में हैं। जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश वकील से कहा कि अगर अब्दुल्ला को शीघ्र रिहा नहीं किया गया, तो वह इस नजरबंदी के खिलाफ उनकी बहन सारा अब्दुल्ला पायलट की बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करेगी। पीठ ने कहा- ‘अगर आप उन्हें रिहा कर रहे हैं, तो जल्द कीजिए। अन्यथा हम इस मामले की गुणदोष के आधार पर सुनवाई करेंगे।’ जब कि कोर्ट के सामने मुद्दा अब्दुल्ला को जेल में रखने के न्यायिक तर्क पर सुनवाई करने का है। उसका इससे कोई संबंध नहीं कि सरकार का इरादा उन्हें रिहा करने का है या नहीं। कोर्ट के रुख से लगता है कि किसी तरह बीच-बचाव कर अब्दुल्ला को रिहा करवा देना उसका फर्ज है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पीठ से अनुरोध किया कि इस मामले की सुनवाई के लिए कोई नजदीक की तारीख निर्धारित की जाए। तब पीठ ने कहा कि उसे नहीं मालूम कब अगली बारी आएगी। साराह अब्दुल्ला पायलट ने इस याचिका में जम्मू कश्मीर जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत अब्दुल्ला को नजरबंद करने के आदेश को चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि वह अपने भाई के सत्यापित फेसबुक एकाउंट की छानबीन करने पर यह देखकर हतप्रभ रह गईं कि जिन सोशल मीडिया पोस्ट को उनका (उमर का) बताया गया है और दुर्भावनापूर्ण तरीके से जिसका उनके खिलाफ इस्तेमाल किया गया है, वह उनका नहीं है। मुद्दा यही है कि क्या ऐसे आधार पर गिरफ्तारी कानूनी है? अगर ऐसा नहीं है तो उसका उत्तरदायित्व तय किया जाना चाहिए। लेकिन किसी तरह बीच का कोई रास्ता निकाल देने में ज्यादा रुचि लेता दिख रहा है।

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