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किसी पर तो कार्रवाई हो!

अगर ये बात सच है, तो बिहार के भाजपा नेता राजीव प्रताप रूडी पर गंभीर कार्रवाई होनी चाहिए। अगर झूठ है, तो फिर बिहार में ही मधेपुरा के पूर्व सांसद और जन अधिकार पार्टी (जाप) के अध्यक्ष राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए थी। इसलिए कि इस मामले को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पप्पू यादव ने दावा किया कि एक स्थान दो दर्जन से ज्यादा एंबुलेंस रूडी ने बिना इस्तेमाल के खड़े कर रखे थे। ये मामले का खुलासा कई जगहों पर रेमडिसिविर सूई, वेंटीलेटर, ऑक्सीजन सिलिंडर आदि जैसी चीजों की जमाखोरी के सामने आए उदाहरणों के बीच हुआ। केंद्र और राज्य सरकारों को इस पर तुरंत सक्रिय हो जाना चाहिए था। लेकिन मामला दबता दिख रहा है। यह एक तरह से आज की त्रासदी के प्रति उन सरकारों की असंवेदनशीलता का भी प्रतीक है। गौरतलब है कि जिन एंबुलेंस की बात हुई, उन सबकी खरीदारी सारण से लोकसभा सांसद राजीव प्रताप रूडी के सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीलैड) के कोष से कोष से की गई थी। एंबुलेंस पर रूडी का नाम लिखा था। अपने समर्थकों के साथ पप्पू यादव पिछले शुक्रवार को अचानक उस जगह पहुंचे, जहां कई सारी एंबुलेंस खड़ी थी।

सुरक्षा कर्मियों से बहस होने के बाद वे परिसर के भीतर चले। बताया गया कि परिसर में कई एंबुलेंस को तिरपाल से ढककर रखा गया था। पप्पू यादव ने ने कहा- ‘लोगों को एक किलोमीटर तक कोविड मरीज को ले जाने के लिए भी 12,000 रुपये तक देने पड़ रहे हैं। एंबुलेंस की घोर किल्लत है और सारण के सांसद ने 100 एंबुलेंस को बिना इस्तेमाल के खड़ा कर रखा है।’ मामला सोशल मीडिया पर गरमाया। राजनीतिक दलों ने बयान भी जारी किए। लेकिन गौरतलब यह है कि एमपीलैड कोष जनता का धन है। इसलिए कई सांसद उससे हुए काम या खरीदारी को अपनी निजी जायदाद नहीं समझ सकता। रूडी के एक समर्थकों ने पप्पू यादव पर परिसर में जबरन घुसने और एंबुलेंस में तोड़फोड़ करने का आरोप लगाया है। पुलिस को बेशक इसकी जांच करनी चाहिए। लेकिन असल मुद्दा यह है कि रूडी ने एंबुलेंस क्यों खड़े कर रखे थे? क्या वे अपने लोगों के लिए उन्हें सुरक्षित रखना चाहते थे? अगर ऐसा है, तो यह घोर अनैतिक व्यवहार है। इस भाजपा की चुप्पी उसकी नैतिकता को भी कठघरे में खड़ा करती है।

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कोरोना से मरने वालों के परिजनों को सरकार मुआवजा नहीं दे सकेगी

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि वह कोरोना से मरने वाले हर मरीज के परिजनों को मुआवजा नहीं दे सकती है। कोरोना से मरे लोगों के परिजनों को मुआवजा दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका पर केंद्र सरकार ने अपना हलफनामा दायर किया है, जिसमें उसने कहा है कि वह सबको मुआवजा नहीं दे सकती है। केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा है कि कोरोना से जिनकी मौत हुई है, उनके परिवारों को सरकार चार लाख रुपए का मुआवजा नहीं दे सकेगी। साथ ही सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि कोरोना से होने वाली हर मौत को कोविड मौत के रूप में दर्ज किया जाएगा।

सरकार ने कहा है कि आपदा कानून के तहत अनिवार्य मुआवजा सिर्फ प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकंप, बाढ़ आदि पर ही लागू होता है। सरकार का कहना है कि अगर एक बीमारी से होने वाली मौत पर मुआवजा दिया जाए और दूसरी पर नहीं, तो यह गलत होगा। केंद्र ने 183 पन्नों के अपने हलफनामे में यह भी कहा है कि इस तरह का भुगतान राज्यों के पास उपलब्ध राज्य आपदा मोचन कोष यानी एसडीआरएफ से होता है। अगर राज्यों को हर मौत के लिए चार लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश दिया गया, तो उनका पूरा फंड ही खत्म हो जाएगा।

केंद्र का कहना है कि अगर कोरोना से मरे लोगों को चार लाख का मुआवजा देने का राज्यों को निर्देश दिया गया तो इससे कोरोना के खिलाफ जारी लड़ाई के साथ ही बाढ़, चक्रवात जैसी आपदाओं से भी लड़ पाना असंभव हो जाएगा। केंद्र ने अदालत को बताया कि कोरोना से होने वाली सभी मौतों को कोविड से हुई मौत के रूप में ही रिकार्ड किया जाना चाहिए। फिर चाहे वह मौतें कहीं भी क्यों न हुईं हों।

गौरतलब है कि अब तक सिर्फ अस्पतालों में हुई कोरोना संक्रमितों की मौत को ही कोविड डेथ के रूप में रिकार्ड किया जाता था। घर पर या अस्पताल की पार्किंग या गेट पर होने वाली मौतों को भी कोविड रिकार्ड में दर्ज नहीं किया जा रहा था। इस वजह से मौत के आंकड़ों में विसंगतियां देखने को मिल रही थीं। सरकार ने इस तरह की हर मौत को कोविड डेथ के रूप में दर्ज करने की बात कही है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अगली सुनवाई सोमवार को करेगा।

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