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टकराव भड़काते डोनल्ड ट्रंप

अमेरिका में पुलिस बर्बरता और नस्लभेद के खिलाफ व्यापक जन प्रतिरोध से एक ऐसा संकट खड़ा हुआ है, जैसा पिछले कई दशकों में नहीं देखा गया। लेकिन राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप इससे परेशान नहीं दिखते। बल्कि वो इस संकट को “अवसर” में तब्दील करने की रणनीति पर चलते दिखते हैं। उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में टकराव बढ़ाने की रणनीति अपना ली है। विरोध प्रदर्शनों के पहले दिन ही उन्होंने कहा कि लूटिंग होगी तो शूटिंग (पुलिस फायरिंग) होगी। फिर इसे एक युद्ध बताया और खुद को कानून-व्यवस्था का राष्ट्रपति घोषित कर दिया। अब उन्होंने वाशिंगटन डीसी में सेना की तैनाती का आदेश भी दे दिया है। ये सब अमेरिका के लिए आम अनुभव नहीं है। वहां नस्लभेद और नस्लभेद आधारित हिंसा भी होती रही है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर लोग सड़कों पर उतर आए हों, ऐसा सिविल लिबर्टीज आंदोलन के बाद कभी नहीं देखा गया। मगर काले नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस हिरासत में मौत के बाद कई शहरों में हिंसा भड़की उठी। प्रदर्शनकारी तोड़फोड़ और आगजनी पर उतारू दिखे। ह्वाइट हाउस के बाहर पुलिस को इकट्ठा हुए प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आंसू गैस के गोले दागने पड़े। कई शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया है। रविवार को प्नर्दशनकारी एक बार फिर पुलिस की बर्बरता पर रोष प्रकट करने के लिए सड़कों पर उतर आए।

ट्रंप प्रशासन ने इन घटनाओं में शामिल लोगों को घरेलू आतंकवादी करार दिया है। मगर जानकार मानते हैं कि सड़कों पर गुस्से का जो उबाल दिख रहा है, उसके लिए ट्रंप की सियासत काफी हद तक जिम्मेदार है। ऐसा नहीं है कि पहले पुलिस हिरासत में काले समुदाय के लोगों के साथ अत्याचार नहीं होता था। मगर तब पीड़ित समुदाय के लोगों को भरोसा होता था कि कानून उनके साथ है। जबकि ट्रंप के दौर में श्वेत श्रेष्ठता की राजनीति इस ढंग से हुई है कि समाज बुरी तरह ध्रुवीकृत हो चुका है। उसका परिणाम अब देखने को मिल रहा है। बहरहाल, तमाम पार्टियों के नेताओं ने लोगों से निहत्थे अश्वेत नागरिक की मौत पर अपना गुस्सा सही तरीके से जाहिर करने की अपील की है। गौरतलब है कि 25 मई को रेस्तरां में बतौर सिक्योरिटी गार्ड का काम करने वाले जॉर्ज फ्लॉयड को पुलिसकर्मियों ने हथकड़ी पहनाकर जमीन पर लिटा दिया था। पांच मिनट तक पुलिस अधिकारी ने अपने घुटने से उन्हें दबाकर रखा, जिससे फ्लॉयड की मौत हो गई।

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