क्योंकि संदर्भ महत्त्वपूर्ण होता है

किसी कंपनी ने करार के किसी शर्त का उल्लंघन किया हो, तो उस पर कार्रवाई जरूर होनी चाहिए। लेकिन हर कार्रवाई का एक संदर्भ भी होता है। इसलिए हम सिर्फ यह मान कर आगे नहीं बढ़ सकते कि प्रेस ट्रस्ट इंडिया ने अगर गलत किया, तो उसे भुगतना चाहिए। प्रश्न यह है कि उसने गलत किया भी हो, तो कार्रवाई के लिए जो समय चुना गया और उसके ठीक पहले जो घटनाएं हुईं, उन्हें नजरअंदाज करना वाजिब नहीं होगा। फिलहाल खबर यह है कि केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) को एक नोटिस भेजकर 84.48 करोड़ रुपये के जुर्माने का भुगतान करने को कहा है।

आवास एवं शहरी मंत्रालय के तहत आने वाले लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस ने सात जुलाई को पीटीआई को नोटिस भेजा, जिसमें दिल्ली में संसद मार्ग स्थित कार्यालय में नियमों के उल्लंघनों का आरोप लगाया गया है। नोटिस में कहा गया कि पीटीआई को गैर-न्यायिक स्टांप पेपर पर लिखित में देना होगा कि वे जमीन का दुरुपयोग और इसे क्षति पहुंचाए जाने की वजह से जुर्माने का भुगतान करेंगे। इसके साथ ही एजेंसी ने जो भी उल्लंघन किए हैं, उन्हें 14 जुलाई तक दूर करेगी या शुल्क का भुगतान कर इन्हें नियमित करेगी। अगर इस जुर्माना राशि का तय समय के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो इस पर अतिरिक्त 10 फीसदी का जुर्माना भी जोड़ा जाएगा।
अगर पीटीआई ने शर्तों का पालन नहीं किया, तो उसे अब तक मिल रही रियायत वापस ले ली जाएगी। अब इसके ठीक पहले की घटना पर गौर करते हैं। जून में प्रसार भारती ने पीटीआई पर राष्ट्र-विरोधी कवरेज का आरोप लगाया था और ग्राहक के बतौर उसकी सेवा रद्द करने की धमकी दी थी। पीटीआई ने चीन में भारतीय राजदूत का इंटरव्यू प्रसारित किया था। उसमे की गई टिप्पणियां प्रधानमंत्री के इस बयान से मेल नहीं खाती थीं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की तरफ से कोई घुसपैठ नहीं हुई है। नरेंद्र मोदी सरकार मीडिया और हेडलाइन मैनेजमेंट के अपने रिकॉर्ड की वजह से काफी चर्चित रही है। पीटीआई की कुछ खबरें इस कार्य में सहायक नहीं रही हैं। इसलिए ये धारणा अगर बने की इसी वजह से इसे निशाना बनाया जा रहा है, तो कहा जा सकता है कि लोगों के ऐसा मानने का आधार मौजूद है।

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